साल 1939 मं छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिला के छोटे से गांव बादराटोला मं जंगल सत्याग्रह के रूप मं अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक बड़ा जनआंदोलन खड़ा होइस। ये आंदोलन महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के ही विस्तार रहिस, जेन ह वन अऊ जनजातीय इलाका तक पहुंचिस। जंगल मं रहइया मनखे मन बर ये सिरिफ आंदोलन नई, अपन हक अऊ अस्मिता बचाय के लड़ई रहिस।
अंग्रेज सरकार के बनाय जंगल कानून मन से गांव-गांव मं भारी असंतोष रहिस। जऊन जंगल ले लोगन के रोजी-रोटी चलत रहिस, ओही जंगल मं प्रवेश, लकड़ी ले जावत, चराई करवत सब मं रोक लगाय जावत रहिस। वनवासीयन के सामूहिक अधिकार छीन ले जावत रहिस। हालत ए तक पहुंच गेय रहिस के जऊन लकड़ी पहले मुफ्त मिलत रहिस, ओला खरीदना पड़त रहिस। एला लोगन दुहरा शोषण मानत रहिन।
साल 1938 मं छुईखदान ले जंगल सत्याग्रह के शुरुआत होइस। ए बात के असर बादराटोला मं दिखिस, जिहां 21 जनवरी 1939 ला सत्याग्रह करे के तय होइस। तुलसीराम मिश्र अऊ बुधराम साहू के अगुवाई मं आसपास के गांव ले लोगन धोती-कुर्ता पहिरे, गांधी टोपी लगाय, हाथ मं तिरंगा झंडा धर के नारा लगावत बादराटोला पहुंचिन। महात्मा गांधी के जय, भारत माता के जय अऊ वंदे मातरम् के गूंज ले माहौल गूंज उठिस। दोपहर तक करीब 1500 ले 2000 लोगन के भीड़ जम्मा हो गे रहिस।
ए भीड़ मं एक जोशीला जवान रामाधीन गोंड़ घलो रहिस, जेन अपन डोंगरी अऊ जंगल बचाय बर आंदोलन मं आगे रहिस। आंदोलन ला दबाय बर क्षेत्र के तहसीलदार सुकदेव देवांगन करीब 50 हथियारबंद पुलिस जवान मन के संग पहुंचिस। जब सत्याग्रही मन हटे नई, त तहसीलदार गोली चलाय के आदेश दे दिस।
गोलीबारी मं सबसे आगे खड़े रामाधीन गोंड़ के छाती मं सीधा गोली लगिस। वो “वंदे मातरम्” के नारा लगावत जमीन मं गिर परिन अऊ वीरगति ला प्राप्त हो गिन। ए गोलीबारी मं कई लोग घायल होइन। राम्हू के पैर मं, मुरहा गोंड़ के जांघ मं, रेवती बाई के पीठ मं अऊ उदासा बाई के सिर मं गोली लगिस। रेवती दास अऊ दुगली बाई घलो घायल होइन।
गांव के लोगन अपन लाड़ले वीर सपूत रामाधीन के देह ला कांधा मं उठाके गांव भर मं घुमाइन। गांव मं शोक अऊ गर्व दूनो के माहौल रहिस। आंखी मन नम रहिन, फेर मन मं अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष के ज्वाला अउ तेज हो गे रहिस।
बादराटोला के जंगल सत्याग्रह छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास मं एक अहम अध्याय आय। ये घटना सिरिफ गोलीबारी नई रहिस, ये जंगल, जमीन अऊ हक खातिर लड़े गेय जनआवाज के प्रतीक बन गे। शहीद रामाधीन गोंड़ के बलिदान आज घलो वनवासी समाज बर प्रेरणा के स्रोत आय।
(श्रेय – आदिशौर्य : छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा)
लेखिका परिचय : श्रीमती संपदा दुबे ने छत्तीसगढ़ी विषय में स्नातकोत्तर (एम.ए.) किया है और वे बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की निवासी हैं। वे छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की गंभीर अध्येता तथा समर्पित लेखिका हैं। क्षेत्रीय भाषा के संरक्षण, संवर्धन और उसे संवैधानिक पहचान दिलाने से जुड़े विषयों पर उनका विशेष ध्यान रहता है।
छत्तीसगढ़ी के इतिहास, व्याकरण, लोकसाहित्य तथा संविधान की 8वीं अनुसूची में इसके समावेश जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे शोधपरक और जागरूकतापूर्ण लेखन करती हैं। Email Id: vlograghav1@gmail.com

