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स्टार हेल्थ इंश्योरेंस को लगा झटका: उपभोक्ता आयोग ने इलाज का दावा खारिज करने पर लगाया जुर्माना

February 16, 2026 : छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने स्वास्थ्य बीमा दावों को तकनीकी आधार पर खारिज करने वाली कंपनियों को कड़ा संदेश दिया है। आयोग ने डॉ. श्वेता अग्रवाल के पक्ष में फैसला सुनाते हुए स्टार हेल्थ एंड एलाइड इंश्योरेंस कंपनी को सेवा में कमी का दोषी पाया और उन्हें न केवल इलाज की राशि, बल्कि मानसिक क्षतिपूर्ति और वाद व्यय का भुगतान करने का भी आदेश दिया है।

यह मामला तब शुरू हुआ जब डॉ. श्वेता अग्रवाल ने सितंबर 2022 में बैंगलोर के श्री श्री कॉलेज ऑफ आयुर्वेदिक साइंस में अपने ‘गृध्रसी’ (साइटिका) का इलाज कराया था। इलाज के बाद उन्होंने 13,132 रुपये का बीमा दावा कंपनी के समक्ष प्रस्तुत किया। हालांकि, स्टार हेल्थ इंश्योरेंस ने इस दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मरीज को यह समस्या पिछले छह महीनों से थी, जिसे पॉलिसी लेते समय छिपाया गया था। कंपनी ने इसे ‘प्री-एग्जिस्टिंग डिजीज’ (पूर्व-विद्यमान बीमारी) की श्रेणी में डालकर भुगतान करने से इनकार कर दिया था।

डॉ. श्वेता ने आयोग को बताया कि उनकी यह पॉलिसी बजाज एलायंस से पोर्ट (हस्तांतरित) की गई थी और उन्होंने पोर्टेबिलिटी के समय अपनी स्वास्थ्य संबंधी सभी जानकारियां स्पष्ट रूप से साझा की थीं। उन्होंने तर्क दिया कि बीमा कंपनी ने बिना किसी ठोस चिकित्सकीय साक्ष्य के केवल डिस्चार्ज समरी में लिखी एक सामान्य बात को आधार बनाकर दावा निरस्त कर दिया।

आयोग के अध्यक्ष आनंद कुमार सिंघल और सदस्य आलोक कुमार पाण्डेय की पीठ ने मामले की बारीकी से जांच की। आयोग ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि डिस्चार्ज समरी में मरीज द्वारा बताए गए लक्षणों का उल्लेख मात्र उसके चिकित्सकीय इतिहास (Medical History) को दर्शाता है, न कि वह किसी पूर्व-विद्यमान गंभीर बीमारी का पुख्ता प्रमाण है। आयोग ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि बीमा कंपनी यह साबित करने में पूरी तरह विफल रही है कि शिकायतकर्ता को पॉलिसी लेने से पहले किसी डॉक्टर द्वारा इलाज दिया गया था या उन्होंने जानबूझकर जानकारी छिपाई थी।

अदालत ने इसे सेवा में कमी मानते हुए आदेश दिया कि स्टार हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी शिकायतकर्ता को 13,132 रुपये की इलाज राशि 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ लौटाए। इसके अतिरिक्त, परिवादिनी को हुई मानसिक प्रताड़ना के लिए 5,000 रुपये और कानूनी खर्च के रूप में 3,000 रुपये का भुगतान 45 दिनों के भीतर करने का निर्देश दिया गया है। यह फैसला उन पॉलिसी धारकों के लिए एक बड़ी राहत है जिनके जायज क्लेम अक्सर ‘पुरानी बीमारी’ का हवाला देकर खारिज कर दिए जाते हैं।

Case Reference : Dr. Sweta Agrawal Vs. Star Health and Allied Ins. Co. Ltd. & Anr

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