बस्तर अंचल के इतिहास म 1774 ले 1779 के बीच होय घटना ला “हलबा क्रांति” या “डोंगर क्रांति” के नाम ले जाने जाथे। एला बस्तर म पहिली बड़े जनजातीय संग्राम माने जाथे। इतिहासकार मन कहिथें कि ए विद्रोह के बाद हलबा समाज ऊपर जऊन नरसंहार होइस, वो इस क्षेत्र के सबसे भीषण घटना म गिने जाथे।
ए संघर्ष के जड़ म बस्तर राजघराना के अंदरूनी विवाद रहिस। काकतीय वंश के शासक दलपत देव के कई रानी रहिन। बड़ी रानी विष्णुकुंवर देवी कांकेर राज परिवार ले रहिन, जेनकर बेटा अजमेर सिंह रहिस। दूसर रानी सुकमा राज परिवार ले रहिन, जेनकर बेटा गजराज सिंह अउ उमराव सिंह रहिन। एक अन्य रानी ले दरियाव देव के जनम होइस। दरियाव देव उमर म अजमेर सिंह ले बड़े रहिस, फेर अजमेर सिंह पटरानी के बेटा होय के कारण खुद ला राजगद्दी के असली हकदार मानत रहिस।
जब दलपत देव बूढ़ा होगे, त उहाँ दरियाव देव ला राजगद्दी सौंप दीन अउ अजमेर सिंह ला डोंगर क्षेत्र के गवर्नर बना दीन। एही समय क्षेत्र म भीषण अकाल पड़ गीस। लोगन मन भूख ले बेहाल होके जंगल के घास, पात अउ पेड़ के छाल खाय ला मजबूर होगे। अराजकता अउ असंतोष बढ़त गीस।
ए हालात म दरियाव देव मराठा, जैपुर राज्य अउ ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के मदद ले डोंगर ऊपर हमला कर दीस। अजमेर सिंह के समर्थन म कांकेर के सेना आ गीस। लड़ई म दरियाव देव हार के जैपुर भाग गीस। फेर कुछ समय बाद दरियाव देव कोटपाड़ क्षेत्र जैपुर ला देके समर्थन हासिल करिस अउ दुबारा हमला करके अजमेर सिंह ला हरा दीस। ए तरह दरियाव देव राजगद्दी म बैठ गीस।
राजसत्ता के विवाद खतम करे बर दरियाव देव कूटनीति के सहारा लीस। ऊपरी रूप ले संधि के नाटक करत बस्तर राज्य ला दुई हिस्सा म बांट दे गीस। जब अजमेर सिंह दरियाव देव ले मिले बर राजमहल गीस, त उहाँ धोखा देके दरियाव देव तलवार ले हमला कर दीस। घायल हालत म अजमेर सिंह बचके निकल गीस, फेर हलबा समाज के भरसक इलाज के बावजूद उहाँ के जान नई बच पाइस।
अजमेर सिंह के मृत्यु के बाद हलबा समाज म भारी आक्रोश फैल गीस। विद्रोह खुल के सामने आइस। दरियाव देव भोसला राज, जैपुर अउ अंग्रेजी फौज के मदद ले ए आंदोलन ला कुचल दीस। बदला के भावना ले कई हलबा मुखिया मन के आंख निकाल दीस, अउ कई मन ला जलप्रपात ले नीचे फिंकवा दीस। ए दमन चक्र हलबा समाज बर गहरा जख्म छोड़ गीस।
आखिर 1779 म बड़ेडोंगर म हलबा प्रमुख मन अउ दरियाव देव के बीच संधि होइस। हलबा समाज राजा के प्रति निष्ठा के शपथ लीस, फेर ए क्रांति बस्तर के इतिहास म जनजातीय स्वाभिमान के प्रतीक बन के दर्ज होगे।
हलबा क्रांति ला भारत म अंग्रेज सत्ता के खिलाफ शुरुआती जनजातीय प्रतिरोध के रूप म भी देखे जाथे। ए घटना बस्तर के जनजातीय अस्मिता अउ संघर्ष के गाथा ला आज घलो जिंदा रखे हे।
(श्रेय – आदिशौर्य : छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा)
लेखिका परिचय : श्रीमती संपदा दुबे ने छत्तीसगढ़ी विषय में स्नातकोत्तर (एम.ए.) किया है और वे बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की निवासी हैं। वे छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की गंभीर अध्येता तथा समर्पित लेखिका हैं। क्षेत्रीय भाषा के संरक्षण, संवर्धन और उसे संवैधानिक पहचान दिलाने से जुड़े विषयों पर उनका विशेष ध्यान रहता है।
छत्तीसगढ़ी के इतिहास, व्याकरण, लोकसाहित्य तथा संविधान की 8वीं अनुसूची में इसके समावेश जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे शोधपरक और जागरूकतापूर्ण लेखन करती हैं। Email Id: vlograghav1@gmail.com

