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  • कोई (कोया) क्रांति 1859: साल जंगल बचाय बर उठिस बस्तर

    छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा (क्रांति) | LawNotify.in Tribal Pride and Revolutionary Legacy of Chhattisgarh

    साल 1859 मं दक्षिण बस्तर के धरती एक बड़े जनआंदोलन के साक्षी बनिस। ये आंदोलन सिरिफ जंगल कटाई के खिलाफ विरोध नइ रहिस, बल्कि ये जनजातीय अस्मिता, परंपरा अऊ जीवन पद्धति बचाय के संघर्ष रहिस। साल अऊ सागौन के घना जंगल बस्तर के जनजाति मन बर जीवन के आधार रहिस। जंगल ले ओमन के भोजन, घर, औजार, देवस्थल अऊ संस्कृति सब जुड़ाय रहिस। जब अंगरेजी हुकूमत अपन वन नीति लागू करके अंधाधुंध कटाई सुरू करिस, त ये हस्तक्षेप जनजाति मन बर सीधा अस्तित्व के सवाल बन गिस।

    1853 मं राजा भोपाल देव के निधन के बाद बस्तर के राजकाज भैरम देव के हाथ मं आइस। फेर अंग्रेजी कूटनीति के चलते मासला रियासत ब्रिटिश नियंत्रण मं आ गिस अऊ बस्तर अप्रत्यक्ष रूप ले अंग्रेजी शासन के अधीन होगे। नई व्यवस्था ले राजा अऊ आम रैयत दुनों असहज रहिन। अंग्रेज प्रशासन धीरे-धीरे जंगल अऊ संसाधन ऊपर नियंत्रण बढ़ावत गिस। हैदराबाद मं रेल लाइन बिछाय बर मजबूत लकड़ी के जरूरत परिस, अऊ बस्तर के साल-सागौन जंगल ओकर प्रमुख स्रोत बन गिन। लकड़ी कटाई के ठेका हैदराबाद के व्यापारी हरीदास भगवान दास ला दे दिये गिस। ठेकेदार अऊ बाहरी मजदूर मन के दबाव मं स्थानीय कोई जनजाति शोषण झेलत रहिन।

    शुरुआत मं जनजाति मन ला लगिस कि कटाई कुछ समय बाद रुक जाही, फेर जब जंगल उजड़ना बंद नइ होइस, त असंतोष खुलके सामने आइस। भोपालपट्टनम के जमींदार राम भोई, भीजी के जुग्गा राजू अऊ जुम्मा राजू, फोतकेल के नागुल दोरला अऊ कोन्या दोरला जइसने अगुवा मन परिस्थिति के गंभीरता ला समझिन। सब्बो मिलके फैसला करिन कि अब एको साल पेड़ कटे नइ देबो। ये निर्णय सीधा अंग्रेजी सत्ता बर चुनौती रहिस।

    ब्रिटिश प्रशासन बंदूकधारी सिपाही मन के सुरक्षा मं कटाई जारी रखिस। जब ये खबर गांव-गांव पहुंचिस, त दोरला अऊ दण्डामी माड़िया जनजाति के लोग भाला, फरसा अऊ मशाल ले जंगल पहुंच गइन। कटी लकड़ी के ढेर मं आग लगा दीस अऊ कई जगह हिंसक झड़प होइस। आंदोलनकारी मन के नारा रहिस, “एक साल पेड़ के बदला एक सिर।” चिंतलनार इलाका के बंजारा घलो लकड़ी व्यापार मं शामिल रहिन, जेन कारण संघर्ष अउ घमासान होगे।

    स्थिति तेजी ले बिगड़त देख सिरोंचा के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन ग्लसफर्ड दक्षिण बस्तर पहुंचिस। संघर्ष के तीव्रता अऊ जनजाति मन के एकजुटता देख आखिरकार अंग्रेज प्रशासन ला पीछे हटना परिस। बस्तर मं लकड़ी के ठेकेदारी प्रथा समाप्त करे गिस अऊ शांति कायम करे बर समझौता होइस। हैदराबाद के निजाम ला अपन लोग मन वापस बुलाना परिस अऊ नागुल दोरला अऊ ओकर साथी मन संग समझौता करना परिस।

    कोया क्रांति बस्तर के पहिली संगठित सशस्त्र जनविद्रोह माने जाथे, जिहां जनजाति मन अपन जंगल अऊ अधिकार बर लड़के अंग्रेज शासन ला झुकाय दीन। ये संघर्ष आज घलो बस्तर के इतिहास मं गर्व के साथ याद करे जाथे, काबर ये आंदोलन बताथे कि जंगल सिरिफ संसाधन नइ, बल्कि जनजातीय जीवन के आत्मा आय।

    (श्रेय – आदिशौर्य : छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा)

    लेखिका परिचय : श्रीमती संपदा दुबे ने छत्तीसगढ़ी विषय में स्नातकोत्तर (एम.ए.) किया है और वे बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की निवासी हैं। वे छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की गंभीर अध्येता तथा समर्पित लेखिका हैं। क्षेत्रीय भाषा के संरक्षण, संवर्धन और उसे संवैधानिक पहचान दिलाने से जुड़े विषयों पर उनका विशेष ध्यान रहता है।

    छत्तीसगढ़ी के इतिहास, व्याकरण, लोकसाहित्य तथा संविधान की 8वीं अनुसूची में इसके समावेश जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे शोधपरक और जागरूकतापूर्ण लेखन करती हैं। Email Id: vlograghav1@gmail.com

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