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पाली (जिला कोरबा) – महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर पाली स्थित प्राचीन शिव मंदिर में भक्ति और श्रद्धा का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। बड़े तालाब के किनारे बने इस ऐतिहासिक मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं। पूरे दिन जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और विशेष पूजा-अर्चना का सिलसिला चलता रहा। मंदिर परिसर ‘हर हर महादेव’ के जयकारों से गूंज उठा।
यह वही प्राचीन स्थल है जिसे स्थानीय परंपराओं के अनुसार राजा विक्रमादित्य की पूजा स्थली माना जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण लगभग 870 ईसा पूर्व के आसपास बताया जाता है। बाद में 11वीं और 12वीं शताब्दी में कलचुरी वंश के राजा जाजलवादेव प्रथम द्वारा इसकी मरम्मत कराई गई थी। मंदिर पर उनका नाम आज भी अंकित है, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को प्रमाणित करता है।
बड़े तालाब के किनारे स्थित यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि स्थापत्य कला का भी उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर पूर्वाभिमुख है और इसकी आंतरिक संरचना अष्टकोणीय है। इसकी चौड़ाई पांच प्लेटफॉर्म पर निर्मित है, जो इसे विशिष्ट बनाती है। मंदिर का निर्माण बलुआ पत्थर से किया गया है।
मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई मूर्तियों की शिल्पकला अबू पहाड़ियों के जैन मंदिरों, सोहागपुर के मंदिरों और खजुराहो के विश्वप्रसिद्ध मंदिरों की शैली से साम्यता रखती है। बारीक नक्काशी और आकृतियों की सजीवता उस समय के कलाकारों की अद्भुत दक्षता को दर्शाती है।
गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग भक्तों के लिए आध्यात्मिक शांति और ऊर्जा का केंद्र है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां विशेष श्रृंगार किया गया और देर रात तक भजन-कीर्तन का आयोजन हुआ।
मंदिर के प्रवेश द्वार के समीप स्थित तालाब अपने नौ कोनों की संरचना के कारण विशेष आकर्षण का केंद्र है। यह तालाब वर्ष भर जल से भरा रहता है। पुरातत्व विभाग द्वारा जब यहां सीमा दीवार निर्माण के लिए उत्खनन किया गया, तब दो प्राचीन मूर्तियां और दो सिक्के प्राप्त हुए थे। इससे इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व की पुष्टि होती है।
पाली का यह प्राचीन शिव मंदिर बन्ना राजवंश के शासनकाल की कला, संस्कृति और धार्मिक आस्था का जीवंत प्रमाण है। महाशिवरात्रि पर यहां उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ ने एक बार फिर साबित कर दिया कि यह स्थल आज भी लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है।