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  • मेरिया (मेलिया) क्रांति, 1842: दंतेवाड़ा के जनजातीय अस्मिता के संग्राम

    छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा (क्रांति) | LawNotify.in Tribal Pride and Revolutionary Legacy of Chhattisgarh

    दक्षिन बस्तर के आज के दंतेवाड़ा इलाका, जिहां जनजातीय समाज अपन देवी-देवता अउ परकृति संग गहिर नाता म जीवन बितावत रहिस, उही धरती म 1842 म एक बड़का हलचल खड़ा होइस, जेन ला इतिहास म “मेरिया” या “मेलिया” क्रांति के नाम ले जानथे।

    बस्तर के माड़िया, मुरिया, गोंड अऊ दूसर जनजाति मन के जिनगी सिरिफ रोजी-रोटी तक सीमित नइ रहिस, बल्कि उंखर पूरा समाजिक अऊ धार्मिक ढांचा अपन आस्था म टिका रहिस। “ताड़ी पेन्नु” या “माटी देव” के पूजा म जेकर भूमिका रहिस, ओकर ला “मेलिया” या “मेरिया” कहे जाथे। ए बात के अफवाह फैलिस कि बस्तर अऊ कालाहांडी इलाका म मेरिया प्रथा चलत हवय।

    सन 1842 के आसपास सिरोंचा के डिप्टी कमिश्नर कैप्टन ग्लसफर्ड ला ए जांच के जिम्मेदारी दी गीस। सीमावर्ती इलाका होय के कारण बस्तर घलो संदेह के घेरे म आइस। ए आधार म अंग्रेज सरकार रायपुर के तहसीलदार शेर खां ला फौजी टुकड़ी संग दंतेवाड़ा मंदिर म तैनात कर दीस।

    दंतेवाड़ा सिरिफ प्रशासनिक केन्द्र नइ रहिस, बल्कि ये इलाका धार्मिक रूप ले घलो बहुते महत्त्वपूर्ण रहिस। वारंगल के काकतीय वंश के राजा अन्नम देव जब बस्तर आइन, त ओमन अपन इष्ट देवी दंतेश्वरी के स्थापना करिन। तब ले ये इलाका जनजातीय आस्था के केन्द्र बन गीस।

    फौज के तैनाती ले जनजाति मन ला लागिस कि उंखर धार्मिक आजादी म दखल होवत हवय। हालात तब अउ बिगड़ गीस जब सैनिक मन ऊपर शोषण, उत्पीड़न अऊ अत्याचार के आरोप लगिन। गांव जरे गइन, महिला मन संग दुर्व्यवहार होइस, अऊ जनजाति मन के भरोसेमंद दीवान दलगंजन सिंह ला पद ले हटा के वामन राव ला बइठा दीस।

    ए सब ले माड़िया समाज म भारी रोष फैल गीस। हिड़मा मांझी के अगुवाई म जनजातीय क्रांतिकारी मन शेर खां अऊ नागपुर राजा के फौज ऊपर छिप-छिप के पारंपरिक हथियार ले हमला करे लगिन। ए संग्राम के मुख्य केन्द्र दक्षिण बस्तर, आज के दंतेवाड़ा जिला रहिस।

    हालांकि बस्तर के राजा भोपाल देव पहिलीच मेरिया प्रथा के अस्तित्व ला नकार दे रहिन, फेर अंग्रेज मन के संदेह खतम नइ होइस। बाद म 1884 म फेर शेर खां ला जगदलपुर भेजे गीस। राजा के अधिकार छीन ले गीस अऊ दंतेश्वरी मंदिर के आसपास खुदाई कराय गीस। मंदिर के पुजारी श्यामसुंदर जिया अऊ स्थानीय जनजाति मन ऊपर दबाव डारिस कि ओमन मेरिया प्रथा के बात कबूल करंय।

    कठोर प्रताड़ना के बाद घलो माड़िया, मुरिया, गोंड अऊ पुजारी मन ए बात ला स्वीकार नइ करिन कि ए इलाका म मेरिया प्रथा चलत रहिस। आखिरकार 1886 म ठोस सबूत के अभाव म अंग्रेज सरकार ला राजा भैरमदेव के सत्ता वापस करना पड़िस।

    मेरिया क्रांति सिरिफ एक धार्मिक मुद्दा नइ रहिस। ए बस्तर के जनजातीय अस्मिता, सांस्कृतिक स्वाभिमान अऊ धार्मिक स्वतंत्रता के लड़ई रहिस। दंतेवाड़ा के ए संग्राम आज घलो ए बात के गवाही देथे कि जब आस्था अऊ पहचान ऊपर खतरा आथे, त जनजातीय समाज संगठित होके खड़ा हो जाथे।

    (श्रेय – आदिशौर्य : छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा)

    लेखिका परिचय : श्रीमती संपदा दुबे ने छत्तीसगढ़ी विषय में स्नातकोत्तर (एम.ए.) किया है और वे बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की निवासी हैं। वे छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की गंभीर अध्येता तथा समर्पित लेखिका हैं। क्षेत्रीय भाषा के संरक्षण, संवर्धन और उसे संवैधानिक पहचान दिलाने से जुड़े विषयों पर उनका विशेष ध्यान रहता है।

    छत्तीसगढ़ी के इतिहास, व्याकरण, लोकसाहित्य तथा संविधान की 8वीं अनुसूची में इसके समावेश जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे शोधपरक और जागरूकतापूर्ण लेखन करती हैं। Email Id: vlograghav1@gmail.com

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