सन् 1876 म बस्तर के धरती म जेन आंदोलन भड़किस, वो सिरिफ एक ठन स्थानीय बगावत नई रहिस, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत अऊ ओकर संग मिलके चलत प्रशासनिक शोषण के खिलाफ संगठित जनआक्रोश रहिस। ये घटना इतिहास म मुरिया क्रांति के नाम ले दर्ज हवय। ए क्रांति के जड़ 1853 म मिलथे, जब कंपनी सरकार बस्तर म प्रवेश करिस अऊ धीरे-धीरे राजकाज म दखल बढ़ाय लगिस।
जगदलपुर अऊ ओकर आसपास के इलाका “पदर राज” के नाम ले जाने जावत रहिस। जनजातीय समाज के जीवन जंगल, जमीन अऊ परम्परा संग गहराई ले जुड़े रहिस। फेर अंग्रेजी शासन लागू होए के बाद रैय्यतवारी व्यवस्था, लगान के दबाव, जंगल ले साल लकड़ी अऊ कच्चा माल के लूट, हस्तशिल्प के पतन अऊ मुंशी-मन के अत्याचार ले हालात बिगड़त गीस। राजा ऊपर जनजातियन के भरोसा बने रहिस, फेर जब अंग्रेज राजपरिवार के परम्परा तोड़के बाहरी मनखे गोपीनाथ कपड़दार ला दीवान बना दिस, त असंतोष खुलके सामने आइस।
दीवान गोपीनाथ धीरे-धीरे एती ताकतवर होगे कि राजा भैरमदेव खुदे कमजोर दिखे लगिन। उर्दू जानइया मुंशी गांव-गांव भेजे गीस, जेन मन जनजातीय संवेदना नई समझ पावत रहिन। फसल होवय या नई होवय, लगान तय रहिस। घर म नागर दिखगे त कर वसूली निश्चित। लगान नई दे पाय त जमीन जब्त, मवेशी ले जावय अऊ कई बेर औरत-मन तक ला उठा ले जावत रहिन। अनाज अऊ सामान ला जबरिया नाममात्र दाम म ले लेय के जेन प्रथा चलत रहिस, वो “बिसाहा पद्धति” कहाय जावत रहिस। ए सब ले जनजातीय समाज भीतर-ही-भीतर सुलगत रहिस।
स्थिति तब अउ बिगड़िस जब राजा भैरमदेव ला प्रिन्स ऑफ वेल्स के भारत आगमन पर मुंबई जाके सलामी दे बर कहे गीस। राजा निकलिन, फेर मारेंगा गांव म कहार-मन आगे बढ़े ले मना कर दिन। आगरवारा परगना के मुरिया जनजाति राजा ले विनती करिन कि वो अंग्रेजन ले भेंट करे नई जावंय। उंकर डर साफ रहिस कि राजा के गैरमौजूदगी म दीवान अऊ मुंशी मन के शोषण अउ तेज हो जाही।
दीवान ए विरोध ला राजद्रोह मानके 18 जनजातियन ला बिना वारंट गिरफ्तार करवा दिस। फेर गांव वाले बीच रास्ता म बंदियन ला छुड़ा लीन। जब राजा लौटत रहिन, त करीब 1500 मुरिया उनला घेर लीन अऊ मुंशी ला बस्तर ले निकाले के मांग करिन। हालात तनावपूर्ण होगे अऊ गोली चलिस। लच्छू, लक्षमन धूर अऊ गंगा शहीद हो गीन, कई जने घायल होइन। ए घटना ले आंदोलन अउ तेज होगे।
आरापुर गांव म सैकड़ों मुरिया जुटके झाड़ा सिरहा ला नेता चुनिन। धनुष-बाण, भाला अऊ पारंपरिक हथियार संग संघर्ष के तैयारी सुरू होइस। बाद म “आम के टहनी” संदेश के प्रतीक बनके गांव-गांव घूमिस अऊ जगदलपुर के सातों परगना ले हजारों जनजाति महल ला चारों ओर ले घेर लीन। चार महीना तक महल घेराबंदी म रहिस। भीतर राजपरिवार घबराय रहिस अऊ बाहर जनाक्रोश बढ़त रहिस।
दीवान गुप्त रूप ले ब्रिटिश अफसर मन ला मदद बर संदेश भेजिस। जवाब म सशस्त्र फौज रवाना होइस। इन्द्रावती नदी के डोंगाघाट म झाड़ा सिरहा के नेतृत्व म विद्रोही सेना अंग्रेजन ला रोके बर खड़ी होइस। गुरिल्ला ढंग ले मुकाबला होइस, फेर गोलीबारी म झाड़ा सिरहा शहीद हो गीन अऊ कई जने घायल हो गीन। ए झटका ले विद्रोही बिखर गीन अऊ अंग्रेज फौज जगदलपुर पहुंच गीस।
जगदलपुर पहुंचके ब्रिटिश अफसर मैकजार्ज खुद ला मध्यस्थ बताइस अऊ दोनों पक्ष के बात सुने के भरोसा दिलाइस। दो दिन तक मांझी, विद्रोही, राजा अऊ दरबारियन के पक्ष सुने के बाद दीवान गोपीनाथ अऊ मुंशी आदित प्रसाद ला पद ले हटा दिस। संग म जनजातियन ला कानून हाथ म नई लेवे के सलाह दिस अऊ राजा ला जनजातीय समस्या सुलझाय के निर्देश मिलिस। एही प्रक्रिया के बाद 8 अप्रैल 1876 ले बस्तर म “मुरिया दरबार” के शुरुआत होइस, जेन ला जनजातीय समस्या के समाधान बर मंच बनाय गीस।
मुरिया क्रांति बस्तर के जनजातीय अस्मिता अऊ स्वाभिमान के प्रतीक आय। ये बताथे कि स्वतंत्रता के भावना जंगल अऊ पहाड़ तक गूंजत रहिस। जनजातीय समाज अपन हक अऊ सम्मान बर संगठित होके लड़ सके, ये बात 1876 म दुनिया देख लिस।
(श्रेय – आदिशौर्य : छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा)
लेखिका परिचय : श्रीमती संपदा दुबे ने छत्तीसगढ़ी विषय में स्नातकोत्तर (एम.ए.) किया है और वे बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की निवासी हैं। वे छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की गंभीर अध्येता तथा समर्पित लेखिका हैं। क्षेत्रीय भाषा के संरक्षण, संवर्धन और उसे संवैधानिक पहचान दिलाने से जुड़े विषयों पर उनका विशेष ध्यान रहता है।
छत्तीसगढ़ी के इतिहास, व्याकरण, लोकसाहित्य तथा संविधान की 8वीं अनुसूची में इसके समावेश जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे शोधपरक और जागरूकतापूर्ण लेखन करती हैं। Email Id: vlograghav1@gmail.com

