छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल के इतिहास मं आजादी बर लड़ई के एक महत्वपूर्ण अध्याय दर्ज हवय, जेन ला आज हमन सरगुजा क्रांति के नाम ले जानथन। ए संघर्ष सिरिफ राजसत्ता के बचाव बर नइ रहिस, बल्कि माटी, अस्मिता अऊ स्वाभिमान के रच्छा बर लड़े गे जनजातीय आंदोलन रहिस।
सन 1792 मं कंपनी सरकार के बढ़त दखल के खिलाफ राजा अजीत सिंह के अगुवाई मं दूसरा बड़ा संघर्ष होइस। अंग्रेज मन धीरे-धीरे देसी रियासत मन ला अपन अधीन लाय के नीति अपनावत रहिन। सरगुजा मं घलो अंग्रेजी हस्तक्षेप बढ़त रहिस अऊ ए बात राजपरिवार अऊ स्थानीय समाज ला स्वीकार नइ रहिस। एही कारण ले विरोध के स्वर तेज होवत गिस अऊ 1792 के संघर्ष ए असंतोष के खुला रूप रहिस।
आगू चलके उदयपुर रियासत मं 1818 ले 1830 तक अंग्रेजी संक्रमण काल देखे गिस। बाद मं राजा कल्याण सिंह शासन संभालिन। करीब 1852 के आसपास अंग्रेज मन कूटनीतिक चाल चलत राजा ऊपर कुशासन के आरोप लगाय सुरू कर दीन। एक हत्या के मामला मं राजा अऊ ओकर भाई मन ला गिरफ्तार कर ले गिस। ए घटना ले राजपरिवार अऊ जनता के भीतर अंग्रेज शासन के खिलाफ गुस्सा गहरावत गिस।
जब 1857 मं देस भर मं पहिली आजादी के संग्राम भभक उठिस, त ओकर लहर सरगुजा तक पहुंचिस। उदयपुर रियासत मं राजपरिवार अऊ स्थानीय जनजातीय समाज अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ खड़े हो गिन। कोल अऊ भगत जइसन जनजाति मन घलो ए आंदोलन मं शामिल होइन। फेर रियासत के सीमित संसाधन अऊ जनजातीय मन के परंपरागत हथियार के चलते ए विद्रोह जियादा दिन तक टिक नइ पाइस। आखिरकार आंदोलन दबा दे गिस अऊ राजा ला गिरफ्तार करके अंडमान जेल भेज दे गिस।
अक्टूबर 1857 मं सरगुजा के पड़ोसी पलामू क्षेत्र मं विद्रोह जोर पकड़ ले रहिस। 1858 मं सरगुजा अऊ पलामू से लगे इलाका के कोल अऊ भगत जनजाति के 800 ले जियादा लोग फेर संगठित होके अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष सुरू कर दीन। ए मन अंग्रेजी ठिकाना मं हमला करिन अऊ भारी नुकसान पहुंचाइन। जब अंग्रेज सरकार ला ए बगावत के जानकारी मिलिस, त अंग्रेज अफसर डाल्टन ब्रिगेडियर डगलस के नेतृत्व मं सेना तैनात कर दिस। सेना के दबाव बढ़तेच बागी जनजातीय मन सरगुजा के पहाड़ी इलाका मं छिप गिन अऊ धीरे-धीरे ए संघर्ष थम गे।
1858 के ए लड़ई मं कई कोल अऊ दूसर जनजातीय वीर मन अपन प्राणों के बलिदान दीन। सरगुजा के ए संघर्ष बताथे के आजादी के लड़ई सिरिफ बड़े शहर मन तक सीमित नइ रहिस, बल्कि दूरस्थ वनांचल अऊ पहाड़ी इलाका मं घलो जनजातीय समाज अपन ढंग ले अंग्रेजी सत्ता के विरोध मं डट के खड़े रहिन।
सरगुजा क्रांति छत्तीसगढ़ के इतिहास मं जनजातीय साहस, आत्मसम्मान अऊ बलिदान के मजबूत प्रतीक आय। ए गाथा आज घलो याद दिलाथे के आजादी के बीज दूर-दराज के इलाका मं घलो गहराई ले रोपे गेय रहिन।
(श्रेय – आदिशौर्य : छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा)
लेखिका परिचय : श्रीमती संपदा दुबे ने छत्तीसगढ़ी विषय में स्नातकोत्तर (एम.ए.) किया है और वे बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की निवासी हैं। वे छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की गंभीर अध्येता तथा समर्पित लेखिका हैं। क्षेत्रीय भाषा के संरक्षण, संवर्धन और उसे संवैधानिक पहचान दिलाने से जुड़े विषयों पर उनका विशेष ध्यान रहता है।
छत्तीसगढ़ी के इतिहास, व्याकरण, लोकसाहित्य तथा संविधान की 8वीं अनुसूची में इसके समावेश जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे शोधपरक और जागरूकतापूर्ण लेखन करती हैं। Email Id: vlograghav1@gmail.com

