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  • भुमकाल 1910: बस्तर के धरती म गूंजे जनजाति के हुंकार

    छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा (क्रांति) | LawNotify.in Tribal Pride and Revolutionary Legacy of Chhattisgarh

    सन 1910 के भुमकाल बस्तर के इतिहास म एक बड़े जनविद्रोह के रूप म दर्ज हवय। ये सिरिफ अंग्रेज शासन के खिलाफ हथियार उठाय के घटना नई रहिस, बल्कि ये जनजाति समाज के अस्मिता, स्वाभिमान अऊ अपन माटी के रच्छा बर लड़े गे संग्राम रहिस। ए आंदोलन के नायक रहिन नेतानार के गोपापदर गांव म जनम लेहे धुरवा जनजाति के वीर गुण्डाधूर, जेनला इलाका म “बाधा” नाम ले घलो जाने जाथे। गुण्डाधूर कोनो राजघराना या जमींदार परिवार ले नई रहिन। ओ मन साधारण जनजाति परिवार ले उठके जनता के भरोसा अऊ हिम्मत के दम पर आंदोलन के अगुवा बनिन।

    भुमकाल शब्द के मतलब इतिहासकार अलग-अलग ढंग ले बताथें। कोनो इसे भूचाल जइसन बड़ा upheaval कहिथे, त कोनो एक क्षेत्र ले उठे व्यापक क्रांति मानिथे। फेर बस्तर के स्थानीय परंपरा म भुमकाल माने ज्वलंत समस्या ऊपर सब परगना के एकजुट बैठक। 1910 म एही किसिम के बैठक ले अंग्रेज शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह के शुरुआत होइस।

    ओ बखत अंग्रेज सरकार के वन नीति ले जनजाति मन के परंपरागत अधिकार छिनत रहिस। जबरिया लगान वसूली, आबकारी नीति, धार्मिक आस्था म हस्तक्षेप, गोटूल जइसन सांस्कृतिक अऊ नैतिक शिक्षा के केंद्र ऊपर रोक, सिपाही अऊ अफसर मन के बेगारी अऊ अत्याचार ले जनता भीतर-ही-भीतर उबलत रहिस। आजीविका के संकट अऊ सामाजिक अपमान के माहौल म भुमकाल के आग सुलगिस।

    विद्रोह के संदेश फैलाय बर एक अनोखा तरीका अपनाय गीस। गुण्डाधूर अऊ उनकर सहयोगी मुकुंद देव, माछमाराट, आयतु महरा समेत सैकड़ों साथी रातभर आम के टहनी म मिर्च बांध के भोर होते दूसर गांव भेज देथें। ए संकेत ला “डारा मिरी” कहे जाथे। जेन गांव म ए टहनी पहुंचत, उहां के लोग समझ जातिन के संगठित होय के बखत आ गे हे।

    22 अक्टूबर 1909 के दशहरा दिन जगदलपुर म 46 परगना के मांझी अऊ जनजाति प्रतिनिधि मन के बड़ी बैठक होइस। ए बैठक म अंग्रेज शासन के अत्याचार ऊपर गंभीर विचार होइस अऊ सशस्त्र संघर्ष के फैसला लेय गीस। रानी सुबरन कुंवर के सामने नेतानार के गुण्डाधूर ला भुमकाल के नायक चुन लीस। दीवान लाल कालिन्द्र सिंह, जेनला जनजाति “लाल बाबा” कहिथे, अपन कटार देके गुण्डाधूर ऊपर भरोसा जताइन अऊ जनता ला संगठित करे म अहम भूमिका निभाइन।

    1 फरवरी ले 16 मार्च 1910 तक पूरा बस्तर विद्रोह के ज्वाला म घिर गे रहिस। 2 फरवरी ला पूसपाल बाजार लूटे गीस अऊ पाठशाला म आग लगा के खुला विद्रोह के शुरुआत होइस। कूकानार पुलिस चौकी अऊ करंजी बाजार ऊपर हमला होइस। टेलीफोन अऊ बिजली लाइन काट के डाक व्यवस्था ठप कर दीस गीस, ताकि अंग्रेज अफसर मन बाहिर मदद नई मंगा सकंय। जगदलपुर 12 दिन तक घेराबंदी म रहिस।

    16 फरवरी ला रायपुर ले अंग्रेज फौज पहुंचिस अऊ इन्द्रावती नदी के खड़का घाट म जबरदस्त मुठभेड़ होइस। संघर्ष एतका भयानक रहिस के नदी के पानी लहू ले लाल हो गे कहे जाथे। अंग्रेज अफसर गायर चालाकी ले “माटी किरिया” के सहारा ले जनजाति मन ला भरोसा दिलाय के कोशिश करिस, फेर बाद म दमन तेज कर दीस गीस। अलग-अलग इलाका म हमला, लूटपाट अऊ अत्याचार के सिलसिला चलिस।

    25 मार्च के अर्धरात्रि म गुण्डाधूर अपन साथी डेबरीधूर अऊ करीब 600 माड़िया संग अंग्रेज फौज ऊपर हमला करिन। फेर धोखा देके सोनु मांझी ला साथ मिला के अलनार जंगल म क्रांतिकारी मन ला मदिरा पिला दीस गीस अऊ नशा म हमला कर दीस गीस। कई वीर शहीद हो गइन। गुण्डाधूर घायल तो होइन, फेर पकड़े नई गइन। ओ मन के अदृश्य हो जाथे संग भुमकाल आंदोलन कमजोर पड़ गे।

    ए संग्राम म बुद्ध मांझी, डोंडा पेद्दा उर्फ डोंडा पुनेम, बंटू धुरवा, हरचंद नाईक, जकरकन भतरा अऊ रोडा पेद्दा जइसन जांबाज सिपाही मन गुण्डाधूर संग डटे रहिन। भुमकाल आज घलो बस्तर के जनजाति समाज बर गर्व अऊ आत्मसम्मान के प्रतीक आय। ये कहानी बताथे के जब माटी अऊ अस्मिता खतरा म पड़थे, त साधारण जन घलो इतिहास रच देथे।

    (श्रेय – आदिशौर्य : छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा)

    लेखिका परिचय : श्रीमती संपदा दुबे ने छत्तीसगढ़ी विषय में स्नातकोत्तर (एम.ए.) किया है और वे बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की निवासी हैं। वे छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की गंभीर अध्येता तथा समर्पित लेखिका हैं। क्षेत्रीय भाषा के संरक्षण, संवर्धन और उसे संवैधानिक पहचान दिलाने से जुड़े विषयों पर उनका विशेष ध्यान रहता है।

    छत्तीसगढ़ी के इतिहास, व्याकरण, लोकसाहित्य तथा संविधान की 8वीं अनुसूची में इसके समावेश जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे शोधपरक और जागरूकतापूर्ण लेखन करती हैं। Email Id: vlograghav1@gmail.com

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