Popular Posts

छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा (क्रांति) | LawNotify.in Tribal Pride and Revolutionary Legacy of Chhattisgarh

सोनाखान के संग्राम अऊ वीर नारायण सिंह के गाथा

सोनाखान के नाम छत्तीसगढ़ के इतिहास म बड़े गउरव ले लिहे जाथे। 1857 के बखत जब देस भर म अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संग्राम भड़कत रहिस, तब रायपुर ले लगभग 135 कोस पश्चिम वनांचल म बसाय गांव सोनाखान घलो क्रांति के गवाह बनिस। ए संग्राम के अगुवई करिन सोनाखान के जमींदार वीर नारायण सिंह।

सन 1830 म सोनाखान के जमींदार रामराय के अकस्मिक निधन होइस। ओकर बाद 35 बछर के नारायण सिंह ला जमींदारी सौंपी गीस। अपन ददा जइसनेच वो ह जनता संग जुड़े रहिन। घोड़ा म चढ़के गांव-गांव घूमत रहिन, लोगन के दुख-दर्द सुनत रहिन अऊ समाधान खोजत रहिन। जनकल्याण खातिर वो ह राजासागर, रानीसागर अऊ नंदसागर नाम के तीन तालाब खुदवाइन। ए काम ले वो ह जनता के बीच बहुत लोकप्रिय हो गइन।

1856 के अगस्त महीना म सोनाखान अऊ आसपास के इलाका म भयानक अकाल पड़ गीस। भूख ले पीड़ित आदिवासी अऊ किसान मन नारायण सिंह लगे पहुंचिन। वो ह करौंद गांव के व्यापारी माखन बनिया ले अनाज अऊ बीज मांगे के गुहार लगाइन, फेर व्यापारी ह इंकार कर दीस। तब नारायण सिंह ह गोदाम के ताला तुड़वा के ओतकेच अनाज निकालिन जतका भूखे जनता बर जरूरी रहिस।

ए बात के शिकायत अंग्रेज अफसर मन तक पहुंच गीस। डिप्टी कमिश्नर सी. ईलियट ह डकैती अऊ लूटपाट के आरोप लगा के 24 अक्टूबर 1856 ला नारायण सिंह ला पकड़वा दीस। ओमन ला सम्बलपुर ले गिरफ्तार कर रायपुर जेल म बंद कर दीस।

1857 म जब देस भर म बगावत के आग भड़किस, त ओकर लहर रायपुर जेल तक पहुंच गीस। तीसरी देशी रेजीमेंट के कुछ सिपाही मन सुरंग बना के 27 अगस्त 1857 ला नारायण सिंह ला जेल ले निकाल दीन। करीब दस महीना चार दिन जेल म रहिके वो ह बाहर आइस।

जेल ले छूटे के बाद तीन महीना म नारायण सिंह ह करीब 500 बंदूकधारी सिपाही के सेना तैयार कर लीस। हथियार, रसद अऊ मोर्चा के पूरी तैयारी कर लीस।

1 दिसंबर 1857 ला अंग्रेज अफसर स्मिथ अपन फौज ले सोनाखान म हमला कर दीस। नाला किनारे पहुंचत ही नारायण सिंह के सिपाही मन तोप अऊ बंदूक ले जवाब दे दीन। भयंकर लड़ई होइस। अंग्रेज फौज भारी पड़त दिखिस त नारायण सिंह अपन सेना ला कुरूपाट पहाड़ी म ले गइन अऊ ऊपर ले गोलाबारी जारी रखिन। रात म अंग्रेज मन खाली गांव म आग लगा दीन। अपन गांव जलत देख के घलो सिपाही मन डटे रहिन।

2 दिसंबर के बिहान पहाड़ी चारों ओर ले घेर लीस गीस। गोला-बारूद खतम होवत देख नारायण सिंह ह जनता के जान बचाय बर आत्मसमर्पण करे के फैसला ले लिन। चर्चा के बहाना म स्मिथ ह धोखा देके ओमन ला पकड़ लीस अऊ 3 दिसंबर ला रायपुर ले चल दीस।

5 दिसंबर 1857 ला अदालत म पेश करे गीस अऊ 9 दिसंबर ला फांसी के सजा सुना दीस। 10 दिसंबर 1857 के बिहान, जनरल परेड के बखत, रायपुर म सार्वजनिक रूप ले वीर नारायण सिंह ला फांसी दे दीस। आज वो जगह रायपुर के जयस्तंभ चौक के रूप म जानाय जाथे।

सोनाखान के संग्राम सिरिफ एक लड़ई नई रहिस, ये छत्तीसगढ़ के माटी म आजादी के पहिली चिंगारी रहिस। वीर नारायण सिंह के बलिदान आज घलो छत्तीसगढ़िया मन बर गर्व अऊ प्रेरणा के स्रोत हवय।

(श्रेय – आदिशौर्य : छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा)

लेखिका परिचय : श्रीमती संपदा दुबे ने छत्तीसगढ़ी विषय में स्नातकोत्तर (एम.ए.) किया है और वे बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की निवासी हैं। वे छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की गंभीर अध्येता तथा समर्पित लेखिका हैं। क्षेत्रीय भाषा के संरक्षण, संवर्धन और उसे संवैधानिक पहचान दिलाने से जुड़े विषयों पर उनका विशेष ध्यान रहता है।

छत्तीसगढ़ी के इतिहास, व्याकरण, लोकसाहित्य तथा संविधान की 8वीं अनुसूची में इसके समावेश जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे शोधपरक और जागरूकतापूर्ण लेखन करती हैं। Email Id: vlograghav1@gmail.com