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एलआईसी को झटका: छिपाई गई बीमारी के आधार पर क्लेम रोकने को कोर्ट ने माना ‘सेवा में कमी’, विधवा को मिलेगा 3 लाख का मुआवजा

January 12, 2026 : छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) के खिलाफ एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि केवल उच्च रक्तचाप (बीपी) या जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं को ‘पूर्व-विद्यमान गंभीर बीमारी’ बताकर बीमा क्लेम खारिज नहीं किया जा सकता। इस फैसले के बाद आयोग ने एलआईसी को आदेश दिया है कि वह मृतक की पत्नी को बीमा राशि के 3 लाख रुपये, 9 प्रतिशत ब्याज और मानसिक क्षतिपूर्ति के साथ भुगतान करे।

यह मामला ग्राम हरदी की निवासी श्रीमती करुणा कौशिक से जुड़ा है। उनके पति, स्वर्गीय दिवाकर कौशिक ने एलआईसी से तीन अलग-अलग बीमा पॉलिसियां ली थीं। दिसंबर 2020 में बीमारी के कारण इलाज के दौरान दिवाकर कौशिक का निधन हो गया। उनकी मृत्यु के बाद जब उनकी पत्नी ने बीमा राशि के लिए दावा किया, तो एलआईसी ने एक पॉलिसी का भुगतान तो आंशिक रूप से कर दिया, लेकिन शेष दो पॉलिसियों (कुल राशि 3 लाख रुपये) का क्लेम यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मृतक ने पॉलिसी लेते समय अपने स्वास्थ्य के बारे में गलत जानकारी दी थी। बीमा कंपनी का तर्क था कि मृतक लंबे समय से उच्च रक्तचाप और शराब के सेवन की समस्या से जूझ रहे थे, जिसे उन्होंने छुपाया था।

सुनवाई के दौरान आयोग के अध्यक्ष आनंद कुमार सिंघल और सदस्यों ने पाया कि बीमा कंपनी ने यह साबित करने के लिए कोई ठोस चिकित्सीय दस्तावेज पेश नहीं किए कि पॉलिसी लेने से पहले मृतक को कोई गंभीर बीमारी थी। आयोग ने दिल्ली उच्च न्यायालय के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियां आज के समय में जीवनशैली से जुड़ी हैं। यदि इनका खुलासा नहीं भी किया गया हो, तो भी यह बीमा दावे को पूरी तरह से खारिज करने का आधार नहीं हो सकता।

कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि बीमा कंपनी यह साबित करने में पूरी तरह विफल रही है कि मृतक ने जानबूझकर कोई जानकारी छिपाई थी। अस्पताल के डिस्चार्ज टिकट में ‘पास्ट हिस्ट्री’ का उल्लेख मात्र एक विवरण है, न कि किसी पुरानी गंभीर बीमारी का पुख्ता सबूत। आयोग ने एलआईसी की इस कार्रवाई को ‘सेवा में कमी’ माना और निर्देश दिया कि परिवादी को 3 लाख रुपये की बीमा राशि, दावा प्रस्तुत करने की तिथि (21 जनवरी 2022) से 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ दी जाए। इसके अलावा, पीड़िता को हुई मानसिक परेशानी के लिए 10,000 रुपये और वाद व्यय के रूप में 5,000 रुपये अतिरिक्त देने का आदेश भी पारित किया गया है।

Case Reference : Smt. Karuna Kaushik Vs. Life Insurance Corporation Of India

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