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  • लिंगागिरी क्रांति: बस्तर के चार वीर संगवारी मन के बलिदान के गाथा

    छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा (क्रांति) | LawNotify.in Tribal Pride and Revolutionary Legacy of Chhattisgarh

    लिंगागिरी क्रांति बस्तर अंचल के इतिहास मं एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप मं याद करे जाथे। साल 1856 मं उठे ये बगावत सिरिफ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह नई रहिस, बल्कि जल, जंगल अऊ जमीन ऊपर जनजातीय समाज के पारंपरिक अधिकार बचाय के संघर्ष रहिस। रियासत काल मं बस्तर परगना पद्धति ले संचालित होत रहिस, जिहां एक परगना के अंतर्गत कई जमींदारी अऊ गांव शामिल रहंय। लिंगागिरी परगना, भोपालपट्नम जमींदारी के हिस्सा रहिस अऊ इही जगह ले अंग्रेजी शासन के खिलाफ असंतोष के चिनगारी भड़क उठिस।

    जब अंग्रेज सरकार लिंगागिरी परगना ला अपन अधीन लेकर भोपालपट्नम रियासत मं मिलाय के योजना बनाइस, त स्थानीय जनजातीय समाज मं भारी रोष फैल गे। अंग्रेज मन के नई राजस्व नीति, अतिरिक्त कर वसूली, पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था मं हस्तक्षेप अऊ जल-जंगल-जमीन ऊपर रोक टोक ले लोगन के भीतर असंतोष गहरावत चलिस। लिंगागिरी परगना के तालुकेदार धर्माराव उर्फ धुर्वाराव ये अन्याय के खिलाफ खड़े होइन। ओमन बस्तर के तात्कालीन शासक भैरमदेव संग मिलके अंग्रेज अतिक्रमण के बारे मं गुहार लगाइन। राजा ले परोक्ष सहानुभूति जरूर मिलिस, फेर खुला समर्थन नई मिल पाइस।

    धुर्वाराव माड़िया, तेलंगा माड़िया अऊ दोरला जनजाति मन ला संगठित कर चिंतानार के पहाड़ी मं अपन छावनी बनाइन। क्रांतिकारी मन अंग्रेज सेना के रसद ले भरे बैलगाड़ी लूटिन अऊ छापामार लड़ई के शुरुआत कर दिन। 3 मार्च 1856 के दिन इलियट के अगुवाई मं आई अंग्रेजी फौज ऊपर सीधा हमला होइस। ये मुठभेड़ कई घंटा तक चलिस, फेर हालात तब बदले जब भोपालपट्नम के जमींदार अंग्रेज मन के साथ दे दिस। ओकर फौज के मदद ले अंग्रेज सेना विद्रोह ला दबा देइस अऊ धुर्वाराव के दल ला भारी नुकसान झेलना पड़िस।

    विद्रोह के बाद अंग्रेज मन धुर्वाराव के परिवार सहित 460 माड़िया महिला अऊ बच्चा मन ला बंदी बना लिन। अपन लोगन के जान बचाय खातिर धुर्वाराव आत्मसमर्पण करे के कठिन फैसला करिन। 5 मार्च 1856 के दिन ओला एक ऊंच पेड़ मं फांसी दे दीस गीस, ताकि ये दमनकारी संदेश दूर-दूर तक पहुंच सके। फेर ये बलिदान ले आंदोलन खत्म नई होइस।

    धुर्वाराव के शहादत के खबर सुनके ओकर संगवारी यादोराव, जेन जमींदार के बेटा रहिन, आक्रोशित हो गइन। ओमन अहीरी जमींदारी के तालुकेदार बाबूराव अऊ अरपल्ली (घोट) के जमींदार व्यंकुट राव संग मिलके करीब 2000 दोरला जनजाति मन ला संगठित कर फिर से अंग्रेज सेना ऊपर हमला करिन। लेकिन अंग्रेजी दबाव अऊ राजनीतिक मजबूरी मं आके यादोराव के अपन पिता ओला बंदी बनवा दिन अऊ भोपालपट्नम मं फांसी दे दीस गीस।

    संघर्ष इही मं थमिस नई। बाबूराव अऊ व्यंकुट राव रोहिल्ला अऊ गोंड सैनिक मन संग मिलके अंग्रेज अफसर गार्टलैण्ड, हॉल अऊ पीटर के टुकड़ी ऊपर धावा बोलिन। हमला मं गार्टलैण्ड मारे गीस। फेर अंग्रेज मन कपट ले बाबूराव ला पकड़ के चांदा भेज दिन, जिहां 21 अक्टूबर 1858 के दिन ओला फांसी दे दीस गीस। व्यंकुट राव बाद मं बस्तर राजमहल मं शरण लेकर फिर संगठित होए के कोशिश करिन, फेर 1860 मं विश्वासघात के चलते ओला घलो पकड़ के अंग्रेज मन फांसी दे दिन।

    इस तरह धुर्वाराव, यादोराव, बाबूराव अऊ व्यंकुट राव – ये चारों संगवारी अपन प्राण न्योछावर करिन। लिंगागिरी क्रांति भले अंग्रेजी ताकत के सामने दबा दीस गीस, फेर ये घटना बस्तर के जनजातीय अस्मिता, स्वाभिमान अऊ स्वतंत्रता के चेतना के प्रतीक बन गे। आज घलो ये गाथा छत्तीसगढ़ के लोकस्मृति मं जिंदा हवय।

    (श्रेय – आदिशौर्य : छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा)

    लेखिका परिचय : श्रीमती संपदा दुबे ने छत्तीसगढ़ी विषय में स्नातकोत्तर (एम.ए.) किया है और वे बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की निवासी हैं। वे छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की गंभीर अध्येता तथा समर्पित लेखिका हैं। क्षेत्रीय भाषा के संरक्षण, संवर्धन और उसे संवैधानिक पहचान दिलाने से जुड़े विषयों पर उनका विशेष ध्यान रहता है।

    छत्तीसगढ़ी के इतिहास, व्याकरण, लोकसाहित्य तथा संविधान की 8वीं अनुसूची में इसके समावेश जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे शोधपरक और जागरूकतापूर्ण लेखन करती हैं। Email Id: vlograghav1@gmail.com

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