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May 4, 2026 : राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (NCDRC) में चल रहे एक महत्वपूर्ण बीमा विवाद में आंध्र प्रदेश स्थित बिजली उत्पादन कंपनी एम/एस सत्यमहर्षि पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड और आईएफएफसीओ-टोकियो जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के बीच टरबाइन रोटर क्षति से जुड़े करोड़ों रुपये के बीमा दावे पर विस्तृत सुनवाई हुई। यह मामला केवल एक बीमा क्लेम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बीमा अनुबंधों में “महत्वपूर्ण तथ्यों के खुलासे”, बीमा ब्रोकर की कानूनी भूमिका और बीमा कंपनियों द्वारा क्लेम अस्वीकृति के मानकों जैसे बड़े कानूनी प्रश्न शामिल हैं।
विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब शिकायतकर्ता कंपनी ने अपने गुन्टूर स्थित पावर प्लांट में टरबाइन जनरेटिंग यूनिट में खराबी आने के बाद मशीनरी ब्रेकडाउन और कॉन्सिक्वेंशल लॉस ऑफ प्रॉफिट पॉलिसी के तहत बीमा दावा किया। कंपनी का आरोप है कि बीमा कंपनी ने 26 मार्च 2012 को दावा यह कहते हुए खारिज कर दिया कि बीमा लेते समय कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया गया था। इसके बाद कंपनी ने एनसीडीआरसी का दरवाजा खटखटाते हुए रिपुडिएशन लेटर को अवैध घोषित करने और नुकसान की भरपाई की मांग की।
शिकायतकर्ता के अनुसार, विवाद का मुख्य कारण एक 11-स्टेज रोटर था, जिसे उसकी सहयोगी कंपनी ऋत्विक पावर प्रोजेक्ट्स लिमिटेड (RPPL), खम्मम से गुन्टूर प्लांट में लगाया गया था। कंपनी ने दावा किया कि इस रोटर को हैदराबाद स्थित टर्बो मशीनरी इंजीनियरिंग इंडस्ट्रीज (TMEI) में तकनीकी परीक्षण और अनुकूलता जांच के बाद स्थापित किया गया था। शिकायतकर्ता ने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया, रोटर की आवाजाही, ट्रांजिट पॉलिसी और इरेक्शन पॉलिसी की जानकारी बीमा ब्रोकर पेराज इंश्योरेंस ब्रोकर्स प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से बीमा कंपनी को पहले से दी गई थी।
वरिष्ठ अधिवक्ता जॉय बसु ने आयोग के समक्ष दलील दी कि बीमा कंपनी का यह आरोप गलत है कि रोटर बदलने की जानकारी छिपाई गई थी। उन्होंने कहा कि मशीनरी ब्रेकडाउन पॉलिसी जारी करने से पहले बीमा कंपनी ने प्री-इंस्पेक्शन कराया था और निरीक्षण रिपोर्ट मिलने के बाद ही 10 मार्च 2009 को पॉलिसी जारी की गई। शिकायतकर्ता का कहना था कि जब बीमा कंपनी पूरी जानकारी और निरीक्षण के बाद पॉलिसी जारी कर चुकी थी, तब बाद में “नॉन-डिस्क्लोजर” का आरोप लगाना कानूनन टिकाऊ नहीं है।
कंपनी ने यह भी तर्क दिया कि बीमा कंपनी रिपुडिएशन लेटर में लिखे गए कारणों से आगे जाकर नए आधार नहीं जोड़ सकती। शिकायतकर्ता के अनुसार, रिपुडिएशन लेटर में किसी विशेष एक्सक्लूजन क्लॉज या पॉलिसी शर्त के उल्लंघन का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था। आयोग के समक्ष यह दलील रखी गई कि “बीमा कंपनी रिपुडिएशन लेटर में दर्ज कारणों से आगे नहीं जा सकती।”
मामले में सर्वेयर रिपोर्ट भी बड़ा विवाद का विषय बनी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि शुरुआती सर्वे ऐसे सर्वेयरों से कराया गया जो आईआरडीए नियमों के अनुसार इस स्तर के नुकसान का आकलन करने के लिए सक्षम नहीं थे। यह भी कहा गया कि अंतिम सर्वेयर एम/एस भाटावडेकर एंड कंपनी ने घटनास्थल का निरीक्षण तक नहीं किया और केवल पुराने निष्कर्षों को दोहराया। शिकायतकर्ता ने अपने स्वतंत्र सर्वेयर रैंक सर्वेयर्स प्राइवेट लिमिटेड की रिपोर्ट का हवाला देते हुए मशीनरी नुकसान लगभग 4 करोड़ रुपये और व्यापारिक लाभ हानि लगभग 3 करोड़ रुपये बताई।
दूसरी ओर, आईएफएफसीओ-टोकियो ने इन सभी आरोपों का कड़ा विरोध किया। बीमा कंपनी की ओर से पेश अधिवक्ता सौरव अग्रवाल ने कहा कि शिकायतकर्ता ने खम्मम और गुन्टूर के बीच रोटर “स्वैप” किए जाने की महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई। बीमा कंपनी का कहना था कि ट्रांजिट पॉलिसी केवल हैदराबाद तक तकनीकी जांच और वापस मूल स्थान तक परिवहन के लिए थी, न कि रोटर को किसी दूसरे प्लांट में स्थायी रूप से लगाने के लिए।
बीमा कंपनी ने यह भी कहा कि बीमा ब्रोकर को दी गई जानकारी को सीधे बीमा कंपनी को दी गई सूचना नहीं माना जा सकता। कंपनी ने आईआरडीए (इंश्योरेंस ब्रोकर्स) रेगुलेशंस, 2002 का हवाला देते हुए कहा कि ब्रोकर बीमा कंपनी का एजेंट नहीं होता, बल्कि वह बीमाधारक के लिए कार्य करता है। बीमा कंपनी ने दलील दी कि “ब्रोकर को जानकारी होना अपने आप बीमा कंपनी को जानकारी होने के बराबर नहीं है।”
आईएफएफसीओ-टोकियो ने यह भी आरोप लगाया कि खम्मम से लाया गया रोटर पहले से ही दोषपूर्ण था और उसे पहले ही 20-स्टेज रोटर से बदला जा चुका था। कंपनी ने कहा कि मूल उपकरण निर्माता सीमेंस से इस रोटर की उपयुक्तता का कोई प्रमाण या मंजूरी नहीं ली गई। बीमा कंपनी के अनुसार, यह तथ्य “मटेरियल फैक्ट” था, जिसे छिपाया गया और इसी कारण दावा अस्वीकृत किया गया।
सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी ने शिकायतकर्ता द्वारा बाद में दाखिल किए गए कई दस्तावेजों पर भी सवाल उठाए। कंपनी ने कहा कि अधिकांश ईमेल और पत्राचार आंतरिक कॉरपोरेट संवाद थे, जिन्हें मूल शिकायत में शामिल नहीं किया गया था और बाद में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया। बीमा कंपनी ने इन्हें “सेल्फ सर्विंग डॉक्यूमेंट्स” बताया।
यह मामला बीमा कानून के कई महत्वपूर्ण सिद्धांतों को भी सामने लाता है, जिनमें “उबेरिमा फाइड्स” यानी सर्वोच्च सद्भावना का सिद्धांत, बीमा अनुबंधों में खुलासे की जिम्मेदारी, एजेंसी कानून और सर्वेयर रिपोर्ट की कानूनी वैधता शामिल हैं। शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले Canara Bank बनाम United India Insurance Co. Ltd. का हवाला देते हुए कहा कि बीमा दावा केवल वैध और स्पष्ट आधार पर ही खारिज किया जा सकता है। वहीं बीमा कंपनी ने भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 182 और आईआरडीए नियमों का सहारा लेते हुए ब्रोकर और एजेंट के बीच अंतर स्पष्ट किया।
करीब एक दशक से अधिक समय से चल रहे इस मामले में कई दौर की बहस, अतिरिक्त साक्ष्य आवेदन और विस्तृत लिखित दलीलें दाखिल की गईं। आयोग ने यह भी दर्ज किया कि 2012 में दायर मूल शिकायत को बीमा कंपनी द्वारा औपचारिक रूप से दावा खारिज किए जाने के बाद वापस लिया गया था और उसके बाद नई शिकायत दाखिल की गई।
इस मामले का अंतिम फैसला औद्योगिक बीमा विवादों, विशेषकर पावर सेक्टर और भारी मशीनरी से जुड़े बीमा दावों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। एनसीडीआरसी का निर्णय यह स्पष्ट कर सकता है कि बीमा कंपनियां “नॉन-डिस्क्लोजर” के आधार पर कब और किन परिस्थितियों में क्लेम खारिज कर सकती हैं, और बीमा ब्रोकर के माध्यम से साझा की गई जानकारी की कानूनी स्थिति क्या होगी।
Case Reference : M/s Satyamaharishi Power Corporation Ltd. v. IFFCO-TOKIO General Insurance Co. Ltd. & Ors., Consumer Complaint No. 197 of 2012 (NCDRC)