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  • भोपालपट्नम क्रांति 1795: बस्तर मं अंग्रेज घुसपैठ के खिलाफ जनजातीय डटकर लड़ई

    छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा (क्रांति) | LawNotify.in Tribal Pride and Revolutionary Legacy of Chhattisgarh

    सन 1795 मं बस्तर के जंगल-पहाड़ मं एक अइसने घटना घटीस जेनला आज भोपालपट्नम क्रांति के नाम ले याद करे जाथे। ये घटना सिरिफ एक टकराव नई रहिस, बल्कि अपन माटी, संस्कृति अऊ अस्मिता बचाय बर जनजातीय समाज के मजबूत इरादा के प्रतीक रहिस।

    सन 1600 मं ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत मं आइस। 1757 मं प्लासी की लड़ाई  के बाद कंपनी के ताकत तेजी ले बढ़िस। 1765 मं बंगाल, बिहार अऊ उड़ीसा के दीवानी मिलिस, त ओकर नजर छत्तीसगढ़ अऊ बस्तर के ओर घलो मुड़ गे। नागपुर कंपनी के एक बड़ा केंद्र बन गे रहिस, अऊ ओतके ले बस्तर मं राज स्थापित करे के संभावना खोजे बर योजना बने लगिस।

    इही सिलसिला मं 1795 मं कंपनी के अधिकारी कैप्टन ब्लण्ट ला बस्तर भेजे गीस। 8 जनवरी 1795 ला वो जूनागढ़ ले निकलिस अऊ कोरिया, मातिन, रतनपुर, रायपुर जइसने जमींदारी पार करत कांकेर पहुंचिस। कांकेर मं मराठा गवर्नर विठ्ठल दिनकर अऊ कांकेर के राजा श्याम सिंह संग ओकर चर्चा होइस। दूनों ह चेतावनी दीस कि बस्तर के इलाका घना जंगल अऊ पहाड़ी हवय, अऊ ओतके राजा दरियाव देव अऊ ओकर बेटा पिरकियन देव बाहरी मनखे मन ऊपर भरोसा नई करंय। खुला हमला नई, फेर छिपके वार करे के संभावना जरूर हवय।

    चेतावनी सुने के बाद ब्लण्ट ह कांकेर वाला रद्दा छोड़ दीस। वो राजनांदगांव, चांदा जिला अऊ अहीरी जमींदारी के रद्दा ले इन्द्रावती नदी पार करत बस्तर घुसई के कोसिस करिस। बाद मं चांदा के बैरागढ़ रद्दा ले घूम के भोपालपट्नम दिगर ले घुसई के प्रयास करिस।

    ब्लण्ट के पहिली कोसिस मं बस्तर के गोंड, कोया अऊ दोरला जनजाति के सैन्य दल मन धनुष-बाण, कुल्हाड़ी अऊ पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र ले हमला कर दीन। जब वो दूसर रद्दा ले भोपालपट्नम तरफ बढ़िस, त गोंड अऊ माड़िया समाज घलो पूरी ताकत ले ओकर सामना करिस।

    जनजातीय मनखे मन ला साफ लगत रहिस कि अंग्रेज शासक मन के आना मतलब अपन संस्कृति, रीति-रिवाज अऊ जंगल-जमीन ऊपर खतरा। वो मन ये हमला बाहरी ताकत ला बस्तर मं घुसने ले रोके बर करिन। ओमन के एकजुट अऊ सशस्त्र विरोध के चलते कैप्टन ब्लण्ट ला आखिरकार वापिस लउटना पड़िस। वो बस्तर के भीतर गहराई तक नई घुस सकिस, सिरिफ सीमा इलाका तक सीमित रहिगे।

    भोपालपट्नम के ये संघर्ष ये बात ला साबित करिस कि बस्तर के जनजातीय समाज अपन स्वायत्तता अऊ सांस्कृतिक पहचान बर कतेक सजग रहिन। अंग्रेजी शासन के शुरुआत मं जिहां अरण्यांचल के स्वतंत्र जीवनशैली धीरे-धीरे प्रभावित होवत रहिस, उहां बस्तर के ये प्रतिरोध एक मजबूत संदेश दे दिस कि बाहरी शासन के खिलाफ यहां के लोग चुपचाप स्वीकार करे वाले नई रहिन।

    भोपालपट्नम क्रांति सिरिफ एक सैन्य टकराव नई, बल्कि अपन जमीन अऊ संस्कृति बर लड़े गे पहिली संगठित जनजातीय प्रतिरोध मं से एक माने जाथे।

    (श्रेय – आदिशौर्य : छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा)

    लेखिका परिचय : श्रीमती संपदा दुबे ने छत्तीसगढ़ी विषय में स्नातकोत्तर (एम.ए.) किया है और वे बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की निवासी हैं। वे छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की गंभीर अध्येता तथा समर्पित लेखिका हैं। क्षेत्रीय भाषा के संरक्षण, संवर्धन और उसे संवैधानिक पहचान दिलाने से जुड़े विषयों पर उनका विशेष ध्यान रहता है।

    छत्तीसगढ़ी के इतिहास, व्याकरण, लोकसाहित्य तथा संविधान की 8वीं अनुसूची में इसके समावेश जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे शोधपरक और जागरूकतापूर्ण लेखन करती हैं। Email Id: vlograghav1@gmail.com

    Law Notify Team

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