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February 5, 2026 : बिलासपुर के जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने स्वास्थ्य बीमा दावों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। आयोग ने आदित्य बिरला हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी को आदेश दिया है कि वह मरीज के इलाज के खर्च का भुगतान केवल इस आधार पर नहीं रोक सकती कि उसे अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं थी।
बीमा कंपनी की मनमानी पर लगाम
यह मामला बिलासपुर की रहने वाली विंध्यवासिनी चंदेल का है, जिन्होंने तीव्र बुखार और सांस लेने में तकलीफ के कारण वासुदेव क्लिनिक एवं नर्सिंग होम में इलाज कराया था। इलाज के बाद जब उन्होंने बीमा कंपनी के पास ₹45,656 का क्लेम पेश किया, तो कंपनी ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मरीज का इलाज ओपीडी के माध्यम से भी हो सकता था और अस्पताल में भर्ती होना अनिवार्य नहीं था। बीमा कंपनी का तर्क था कि जांच रिपोर्ट के अनुसार मरीज की स्थिति स्थिर थी।
डॉक्टर का निर्णय ही सर्वोपरि
आयोग के अध्यक्ष आनंद कुमार सिंघल और सदस्यों ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि किसी मरीज को अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता है या नहीं, इसका निर्णय केवल डॉक्टर की विशेषज्ञता पर छोड़ देना चाहिए। आयोग ने अपने आदेश में कहा कि मरीज या उसके परिजन आपातकालीन स्थिति में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए डॉक्टर की सलाह पर ही अस्पताल में भर्ती होते हैं। बीमा कंपनी का यह एकपक्षीय निर्णय कि भर्ती होना आवश्यक नहीं था, उसकी सेवा में कमी को दर्शाता है।
अदालत का फैसला और मुआवजा
उपभोक्ता आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि बीमारी पॉलिसी के दायरे में आती है, तो बीमाकर्ता खर्चों की प्रतिपूर्ति करने के लिए बाध्य है। आयोग ने आदित्य बिरला हेल्थ इंश्योरेंस को निर्देश दिया कि वह परिवादिनी को चिकित्सा व्यय के ₹45,656 का भुगतान 9% वार्षिक ब्याज के साथ करे। इसके अलावा, मानसिक परेशानी के लिए ₹5,000 और वाद व्यय के रूप में ₹5,000 की अतिरिक्त राशि देने का भी आदेश दिया गया है।
Case Reference : Vindhyawasini Chandel Vs. Aditya Birla Health Insurance Co. Ltd.