बस्तर रियासत के तारापुर परगना, जऊन आज के बस्तर जिला के बकावंड तहसील म आवत हे, उहां 1842 ले 1854 के बीच एक बड़ा जनजातीय बगावत भड़किस। ये बगावत के जड़ म रहिस कर के बढ़ोत्तरी, बाहरी शासन के दबाव अऊ जनजातीय परंपरा म दखल।
भोसला राज अऊ अंगरेजी हुकूमत के समझौता के बाद बस्तर म राज-काज नागपुर के राजा रघुजी तृतीय के अधीन तो आ गे, फेर असल म फैसला अंगरेज रेजिडेंट के मंशा ले होवत रहिस। 1830 ले 1854 के बीच राजस्व व्यवस्था म बदलाव होइस, कुछ परगना म लगान बढ़ा दीस। ए बदलाव ले जनजातीय इलाका म असंतोष पसर गे।
ओ बखत बस्तर के राजगद्दी म काकतीय वंश के महिपाल देव के बेटा भोपाल देव बइठे रहिन। राज-काज चलाय बर अलग-अलग इलाका म दीवान नियुक्त करे के परंपरा रहिस। 1842 म राजा भोपाल देव अपन भाई दलगंजन सिंह ला तारापुर के दीवान बनाइन। दलगंजन सिंह अपन सादगी अऊ बहादुरी से मुरिया, माड़िया, हलबा, भतरा अऊ गोंड समाज म बहुत लोकप्रिय रहिन।
तारापुर ओ बखत सिरिफ राजस्व इलाका नई रहिस, बलुक जैपुर रियासत के खिलाफ एक सैनिक छावनी जइसन रणनीतिक जगह माने जाथे। जब अंगरेज अऊ मराठा फौज इहां डेरा डारे लगिन, त वन संपदा के बेहिसाब दोहन शुरू हो गे। जनजातीय परंपरा, धार्मिक मान्यता अऊ वन आधारित जीविका म दखल बढ़ गे। ऊपर ले लगान बढ़ाय के दबाव बनिस। “टकोली” के नाम ले अतिरिक्त वसूली के कोशिश होवत रहिस।
दीवान दलगंजन सिंह ये बढ़ोत्तरी के विरोध करिन। नागपुर सरकार के दबाव बढ़े लगिस त उंकर सामने दू रस्ता रहिस – या त कर बढ़ाके अपन जनता ऊपर बोझ डारंय, या फेर पद छोड़ दंय। दलगंजन सिंह जनजातीय लूट ला मंजूर नई करिन अऊ तारापुर छोड़के जैपुर जाए के फैसला करिन।
ए बीच राजा भोपाल देव जगबंधु ला नया दीवान बना दीन। जगबंधु के व्यवहार ले जनजाति अउखरा गे। जब दलगंजन सिंह के तारापुर छोड़के जाए के खबर फइलिस, त स्थानीय जनजाति उंकर पास पहुंचिन अऊ बिनती करिन के उहां रहके अंगरेज-मराठा शासन के खिलाफ बगावत करे। उंकर भरोसा रहिस के वो मन दलगंजन सिंह के सम्मान वापिस दिलाहीं।
जब ये आंदोलन के भनक जगबंधु ला लगिस, त वो राजा भोपाल देव ला बताय बर जगदलपुर निकर गीस। रस्ता म जनजाति मन ओकर ला पकड़ के बंदी बना लीन अऊ उंकर सहयोगी जगन्नाथ बैदार संग प्रताड़ित करिन। बाद म राजा के आदेश से दलगंजन सिंह जगबंधु ला छोड़ दीन।
जगबंधु नागपुर पहुंच के मदद मांगे। अंगरेज अऊ मराठा फौज तारापुर आ पहुंचिस। रणनीति से जनजातीय टुकड़ी मन ला अलग-अलग कर के कुचल दीन गीस। हालात बिगड़त देख के दलगंजन सिंह अपन लोगन के जान बचाय बर आत्मसमर्पण करे बर मजबूर हो गीन। ओकर ला नागपुर जेल म छह महीना बंद रखे गीस।
दीवान के बंदी बनाय जइसे कदम ले जनजातीय असंतोष अउ बढ़ गे। जब नागपुर रेजीमेंट के अफसर मन ला असली कारण समझ म आइस, त मेजर विलियम्सन जगबंधु ला पद ले हटाके दलगंजन सिंह ला रिहा कर दीन अऊ फिर से तारापुर के दीवान नियुक्त कर दीन। संग म बढ़ाय गे नया लगान के आदेश ला भी वापस ले ले गीस।
ए तरह तारापुर क्रांति सिरिफ सशस्त्र संघर्ष नई रहिस, बलुक जनजातीय अस्मिता, आर्थिक अधिकार अऊ परंपरा के रक्षा बर लड़े गे संग्राम रहिस। आखिरकार अंगरेजी हुकूमत ला झुकना परे, अऊ ये घटना बस्तर के इतिहास म जनजातीय एकता अऊ प्रतिरोध के महत्वपूर्ण अध्याय बन गे।
(श्रेय – आदिशौर्य : छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा)
लेखिका परिचय : श्रीमती संपदा दुबे ने छत्तीसगढ़ी विषय में स्नातकोत्तर (एम.ए.) किया है और वे बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की निवासी हैं। वे छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की गंभीर अध्येता तथा समर्पित लेखिका हैं। क्षेत्रीय भाषा के संरक्षण, संवर्धन और उसे संवैधानिक पहचान दिलाने से जुड़े विषयों पर उनका विशेष ध्यान रहता है।
छत्तीसगढ़ी के इतिहास, व्याकरण, लोकसाहित्य तथा संविधान की 8वीं अनुसूची में इसके समावेश जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे शोधपरक और जागरूकतापूर्ण लेखन करती हैं। Email Id: vlograghav1@gmail.com

