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  • रानी चो-रिस 1878: बस्तर के रानी अऊ जनजातीय मइयाँ मन के अनोखा प्रतिरोध

    छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा (क्रांति) | LawNotify.in Tribal Pride and Revolutionary Legacy of Chhattisgarh

    1878 म बस्तर म घटे रानी चो-रिस के घटना इतिहास के एक अलग किसिम के प्रतिरोध के रूप म देखे जाथे। ये कोनो सशस्त्र संग्राम नई रहिस, बल्कि परंपरा अऊ अस्मिता के पक्ष म खड़े होय एक संगठित सामाजिक विरोध रहिस। राजमहल के रानी अऊ दण्डामी माड़िया, मुरिया अऊ हलबा जनजाति के मइयाँ मन मिलके अपन राजा अऊ ब्रिटिश सरकार के निर्णय के खिलाफ आवाज उठाइन। ब्रिटिश प्रतिवेदन म घलो एला विद्रोह के बजाय विरोध कहे गेय रहिस। “रानी चो-रिस” के अर्थ ही आय रानी के क्रोध।

    ये आंदोलन के केन्द्र रहिस बारसूर म स्थित बत्तीसा महल, जेन ह आज बत्तीसा मंदिर के रूप म जाने जाथे। एही जगह ले रानी जुगुराज कुंवर अपन विरोध के स्वर बुलंद करिन। ओ समय बस्तर के शासक रहिन भैरमदेव। राजा के पहिली ले दू रानी रहिन, जुगुराज कुंवर अऊ सुवर्ण कुंवर, जेमन म जुगुराज कुंवर पटरानी रहिन अऊ राजपरंपरा के प्रमुख संरक्षक माने जाथे रहिन।

    अंग्रेज सरकार अपन कूटनीति के तहत राजा ऊपर दबाव डारिस कि वो एक मुस्लिम महिला नावाबाई संग विवाह करंय। ये निर्णय बस्तर राजवंश के परंपरा ले अलग रहिस अऊ राजपरिवार के भीतर असंतोष के कारण बनिस। रानी जुगुराज कुंवर एला सिरिफ व्यक्तिगत मामला नई मानेन, बल्कि एला परंपरा अऊ राजगौरव के खिलाफ कदम समझिन। वो खुला विरोध करिन अऊ महल के भीतर ले निकलके अपन असहमति जताइन।

    रानी के साथ स्थानीय जनजातीय मइयाँ मन घलो एकजुट हो गिन। दण्डामी माड़िया, मुरिया अऊ हलबा समाज के महिलाएं सड़क म उतर गिन अऊ साफ शब्द म अपन मांग रखिन कि राजा या त नावाबाई ला त्याग देवंय, नइ त राजगद्दी छोड़ देवय। ये विरोध धीरे-धीरे एक लंबा आंदोलन बन गेय जेन ह लगभग आठ बछर तक जारी रहिस।

    लगातार जनदबाव अऊ रानी के अडिग रुख के चलते आखिरकार अंग्रेज सरकार ला झुकना परिस। रानी चो-रिस के घटना ये बताथे कि बस्तर के समाज म महिलाएं सिरिफ दर्शक नई रहिन, बल्कि सामाजिक अऊ राजनीतिक निर्णय म सक्रिय भूमिका निभाइन। ये संघर्ष बिना हथियार के रहिस, फेर आत्मसम्मान अऊ परंपरा के रक्षा बर लड़े गेय एक मजबूत जंग रहिस।

    रानी चो-रिस आज घलो बस्तर के इतिहास म जनजातीय एकजुटता अऊ महिला नेतृत्व के प्रतीक के रूप म याद करे जाथे।

    (श्रेय – आदिशौर्य : छत्तीसगढ़ की जनजातीय गौरव गाथा)

    लेखिका परिचय : श्रीमती संपदा दुबे ने छत्तीसगढ़ी विषय में स्नातकोत्तर (एम.ए.) किया है और वे बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की निवासी हैं। वे छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की गंभीर अध्येता तथा समर्पित लेखिका हैं। क्षेत्रीय भाषा के संरक्षण, संवर्धन और उसे संवैधानिक पहचान दिलाने से जुड़े विषयों पर उनका विशेष ध्यान रहता है।

    छत्तीसगढ़ी के इतिहास, व्याकरण, लोकसाहित्य तथा संविधान की 8वीं अनुसूची में इसके समावेश जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे शोधपरक और जागरूकतापूर्ण लेखन करती हैं। Email Id: vlograghav1@gmail.com

    Law Notify Team

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