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छत्तीसगढ़ विधानसभा में धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026 पारित, विपक्ष का वॉकआउट

छत्तीसगढ़ विधानसभा ने गुरुवार को छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता विधेयक, 2026 को ध्वनि मत से पारित कर दिया। यह विधेयक ऐसे समय पारित हुआ जब विपक्ष ने इसे प्रवर समिति (Select Committee) को भेजने की मांग खारिज होने पर सदन से वॉकआउट कर दिया।

यह विधेयक गृह मंत्री विजय शर्मा द्वारा पेश किया गया, जिसका उद्देश्य बल, प्रलोभन, कपट, विवाह या डिजिटल माध्यमों के जरिए किए जाने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाना है। राज्य सरकार का कहना है कि वर्ष 1968 का पुराना कानून वर्तमान तकनीकी और सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप पर्याप्त नहीं था, इसलिए इसे और सख्त बनाया गया है।

विपक्ष के नेता चरण दास महंत ने विधेयक को जल्दबाजी में लाया गया कदम बताते हुए कहा कि इस तरह के कानूनों पर सुप्रीम कोर्ट में पहले से सुनवाई चल रही है, इसलिए राज्य को फैसला आने तक इंतजार करना चाहिए था। उन्होंने विधेयक को विस्तृत समीक्षा के लिए प्रवर समिति को भेजने की मांग भी की थी।

हालांकि, सदन में अध्यक्ष द्वारा विधेयक पेश करने की अनुमति दिए जाने के बाद कांग्रेस विधायकों ने विरोध में वॉकआउट कर दिया। इस पर गृह मंत्री विजय शर्मा ने कहा कि यह वॉकआउट नहीं बल्कि विपक्ष का “भागना” है।

सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया कि संविधान राज्य सरकारों को ऐसे कानून बनाने का अधिकार देता है और सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकार के कानूनों पर कोई रोक नहीं लगाई है।

राज्य के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह कानून:
यह विधेयक राज्य में धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक संतुलन के मुद्दे पर एक बड़ा नीतिगत बदलाव माना जा रहा है। सरकार का दावा है कि इससे अवैध धर्मांतरण पर रोक लगेगी, जबकि आलोचकों का मानना है कि इसके प्रावधानों का दायरा व्यापक है, जिससे सामाजिक और कानूनी विवाद बढ़ सकते हैं।

विधेयक के प्रमुख प्रावधान:

  • बल, धोखे, प्रलोभन या डिजिटल माध्यम से धर्मांतरण अब संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध होगा।
  • दोषियों के लिए 7 से 10 वर्ष तक की सजा और न्यूनतम 5 लाख रुपये का जुर्माना तय किया गया है।
  • सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में सजा 10 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक और जुर्माना 30 लाख रुपये तक हो सकता है।
  • नाबालिग, महिला, दिव्यांग और SC/ST/OBC वर्ग के लोगों के धर्मांतरण पर 10 से 20 वर्ष तक की सजा का प्रावधान है।
  • ‘प्रलोभन’ की परिभाषा में मुफ्त शिक्षा, इलाज, नौकरी या बेहतर जीवनशैली का वादा भी शामिल किया गया है।
  • “घर वापसी” यानी पूर्वजों के धर्म में लौटने को धर्मांतरण नहीं माना जाएगा।
  • स्वैच्छिक धर्म परिवर्तन के लिए जिला मजिस्ट्रेट को पूर्व सूचना देना अनिवार्य होगा और आवेदन सार्वजनिक किया जाएगा।
  • विवाह के उद्देश्य से किया गया धर्मांतरण या धर्मांतरण के लिए किया गया विवाह शून्य और अवैध होगा।
  • मामलों की जांच सब-इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी करेंगे और विशेष अदालतों में 6 महीने के भीतर सुनवाई पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है।

विरोध और प्रतिक्रिया:
विधानसभा के बाहर भी इस विधेयक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए। जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) के नेता अमित जोगी ने इसे मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताते हुए राज्यपाल से इसे वापस भेजने की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि विधेयक को पर्याप्त चर्चा के बिना जल्दबाजी में पारित किया गया है।