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Justice Amitendra Kishore Prasad

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: संतान खोने वाले दंपत्ति को मिली IVF की अनुमति, उम्र की सीमा नहीं बनेगी बाधा

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के हक में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने एक ऐसे दंपत्ति को इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (IVF) उपचार शुरू करने की अनुमति दे दी है, जिसमें पति कानून द्वारा निर्धारित आयु सीमा को पार कर चुका है।

न्यायमूर्ति अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि “परिवार बनाने का अधिकार” संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का एक मौलिक हिस्सा है। कोर्ट ने कहा कि कानून के तकनीकी पहलुओं को मानवीय संवेदनाओं और मौलिक अधिकारों पर हावी नहीं होने दिया जा सकता।

क्या था पूरा मामला?

याचिकाकर्ता दंपत्ति (49 वर्षीय पत्नी और 55 वर्षीय पति) ने बिलासपुर के एक फर्टिलिटी सेंटर द्वारा उपचार से इनकार किए जाने के बाद कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस दंपत्ति ने साल 2022 में अपनी इकलौती बेटी को खो दिया था, जिसके गहरे सदमे के कारण वे समय पर निर्णय नहीं ले पाए।

जब वे मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार हुए, तब तक पति की उम्र सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021 (ART Act) की धारा 21(g) के तहत निर्धारित 55 वर्ष की सीमा को मामूली रूप से पार कर चुकी थी।

कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ

  • उम्र की सीमा और संवैधानिक अधिकार: कोर्ट ने माना कि पति की उम्र सीमा पार होने के बावजूद, पत्नी अभी भी 50 वर्ष की कानूनी सीमा के भीतर है। चूंकि दोनों चिकित्सकीय रूप से फिट हैं, इसलिए पति की उम्र को पत्नी के उपचार के रास्ते में बाधा नहीं माना जाना चाहिए।
  • उद्देश्यपूर्ण व्याख्या: न्यायमूर्ति प्रसाद ने कहा कि विशेष परिस्थितियों में कानून की व्याख्या लचीली होनी चाहिए। दंपत्ति द्वारा की गई देरी का कारण उनकी इकलौती संतान की मृत्यु थी, जो एक अपूरणीय क्षति है।
  • उपचार जारी रखने का निर्देश: अदालत ने इंदिरा आईवीएफ फर्टिलिटी सेंटर को तत्काल उपचार शुरू करने का आदेश दिया। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया कि यदि प्रक्रिया के दौरान पत्नी 50 वर्ष की आयु पार कर लेती है, तब भी उपचार बीच में नहीं रोका जाएगा।