Popular Posts

Consumer Protection

छत्तीसगढ़ आयोग ने वाहन ऋण विवाद में उपभोक्ता को राहत देते हुए जिला आयोग का आदेश रद्द कर पुनः सुनवाई के निर्देश दिए।

April 8, 2026 : छत्तीसगढ़ राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने एक महत्वपूर्ण फैसले में बैंकिंग विवाद से जुड़े मामले में उपभोक्ता को आंशिक राहत देते हुए जिला आयोग के आदेश को निरस्त कर दिया और मामले की पुनः सुनवाई के निर्देश दिए हैं। यह आदेश 8 अप्रैल 2026 को पारित किया गया।

मामला मनोज कुमार कुलु और इंडसइंड बैंक के बीच वाहन ऋण से जुड़े विवाद का है। अपीलकर्ता ने वर्ष 2019 में बैंक से करीब 16.30 लाख रुपये का वाहन ऋण लिया था, जिसकी मासिक किश्तें निर्धारित थीं। अपीलकर्ता का कहना था कि वह नियमित रूप से किश्तें जमा कर रहा था, लेकिन वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी के कारण उसकी आय पूरी तरह प्रभावित हो गई, जिससे कुछ किश्तों का भुगतान नहीं हो सका।

अपीलकर्ता के अनुसार, उसने बैंक को स्थिति से अवगत कराया और बकाया भुगतान करने की इच्छा भी जताई, लेकिन इसके बावजूद बिना किसी पूर्व सूचना के उसका वाहन जबरन जब्त कर लिया गया और बाद में बेच दिया गया। उसने यह भी आरोप लगाया कि बैंक ने उसकी सहमति के बिना ऋण राशि का एक हिस्सा दूसरे खाते में ट्रांसफर कर दिया, जो नियमों के विरुद्ध है।

वहीं, बैंक की ओर से कहा गया कि अपीलकर्ता ने ऋण की शर्तों का पालन नहीं किया और नियमित भुगतान में चूक की। बैंक ने यह भी तर्क दिया कि अपीलकर्ता उपभोक्ता की श्रेणी में नहीं आता क्योंकि उसने एक से अधिक बार फाइनेंस कराया था।

जिला आयोग ने पहले इस शिकायत को खारिज कर दिया था। हालांकि, राज्य आयोग ने मामले की समीक्षा करते हुए पाया कि जिला आयोग ने यह मान लिया था कि मामला मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) के कारण सुनवाई योग्य नहीं है, जबकि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि मध्यस्थता प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी और कोई अंतिम आदेश भी पारित नहीं हुआ था।

राज्य आयोग ने कहा कि ऐसी स्थिति में उपभोक्ता आयोग के पास मामले की सुनवाई का अधिकार बना रहता है। इसलिए जिला आयोग का आदेश विधि के अनुरूप नहीं है और इसे निरस्त किया जाना चाहिए।

आयोग ने मामले को पुनः जिला आयोग को भेजते हुए निर्देश दिया कि दोनों पक्षों को अतिरिक्त दस्तावेज और साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाए और मामले का शीघ्र निपटारा किया जाए। दोनों पक्षों को 4 मई 2026 को जिला आयोग के समक्ष उपस्थित होने के लिए कहा गया है।

यह फैसला उपभोक्ता अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, खासकर उन मामलों में जहां बैंकिंग संस्थाओं द्वारा ऋण वसूली की प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं।

Case Reference : Manoj Kumar Kulu Vs. B.M., Indusind Bank & Anr.