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छत्तीसगढ़ी को 8वीं अनुसूची में स्थान: पहचान, अधिकार और विकास की अनिवार्य दिशा ?

बिलासपुर : भारत की ताकत उसकी भाषाई विविधता में है। यह देश केवल भौगोलिक सीमाओं से नहीं, बल्कि अपनी असंख्य भाषाओं, बोलियों और सांस्कृतिक परंपराओं से पहचाना जाता है। हर राज्य की आत्मा उसकी मातृभाषा में बसती है। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है, क्योंकि यहां का लोकजीवन, सामाजिक व्यवहार, लोककला, परंपराएं और सांस्कृतिक चेतना छत्तीसगढ़ी के माध्यम से ही व्यक्त होती है। ऐसे में यह प्रश्न केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि संवैधानिक और नीतिगत बन जाता है कि छत्तीसगढ़ी को संविधान की 8वीं अनुसूची में स्थान कब और क्यों मिलना चाहिए।

छत्तीसगढ़ी को अक्सर एक क्षेत्रीय बोली के रूप में सीमित कर दिया जाता है, जबकि भाषावैज्ञानिक और ऐतिहासिक दृष्टि से इसका स्वरूप कहीं अधिक विकसित और संगठित है। उपलब्ध अध्ययन सामग्री स्पष्ट करती है कि छत्तीसगढ़ी का विकास वैदिक संस्कृत से होते हुए प्राकृत, अपभ्रंश और अर्धमागधी की परंपरा से हुआ है । इसे पूर्वी हिंदी की एक प्रमुख शाखा माना गया है, जिसकी अन्य शाखाएं अवधी और बघेली हैं। यह तथ्य दर्शाता है कि छत्तीसगढ़ी की जड़ें भारतीय भाषाई परंपरा में गहराई तक समाई हुई हैं। इसका विकास आकस्मिक या सीमित नहीं, बल्कि क्रमिक और ऐतिहासिक है। किसी भाषा की प्रामाणिकता उसके इतिहास से तय होती है, और इस कसौटी पर छत्तीसगढ़ी पूरी तरह खरी उतरती है।

छत्तीसगढ़ में भाषाई विविधता अत्यंत समृद्ध है। अध्ययन सामग्री के अनुसार यहां लगभग 93 भाषाएं और बोलियां प्रचलित हैं। इस विविधता के बीच छत्तीसगढ़ी संपर्क भाषा की भूमिका निभाती है। यह केवल एक समुदाय की भाषा नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के सामाजिक ताने-बाने को जोड़ने वाली कड़ी है। दो करोड़ से अधिक लोग इसे अपनी दैनिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते हैं। ग्रामीण समाज हो, आदिवासी अंचल हो या शहरी क्षेत्र, छत्तीसगढ़ी सहज संवाद की भाषा है। जब कोई भाषा इतनी व्यापक सामाजिक स्वीकृति रखती हो, तो उसे संवैधानिक मान्यता से वंचित रखना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।

छत्तीसगढ़ी का साहित्यिक और व्याकरणिक स्वरूप भी उतना ही सुदृढ़ है। इसके साहित्य को गाथायुग, भक्तिकाल और आधुनिक काल में विभाजित किया गया है, जो यह संकेत देता है कि इसका साहित्यिक विकास व्यवस्थित और कालखंडों में विभाजित है। लोकगीत, लोककथाएं, कहावतें, मुहावरे और लोकनाट्य इसकी सांस्कृतिक गहराई को प्रमाणित करते हैं। भाषा की परिपक्वता उसके व्याकरण से भी सिद्ध होती है। शब्द-साधन, संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया, उपसर्ग, प्रत्यय, संधि और समास जैसे विषयों का सुव्यवस्थित वर्णन यह दर्शाता है कि छत्तीसगढ़ी का अपना स्वतंत्र व्याकरणिक ढांचा है। यह सब मिलकर यह स्थापित करता है कि छत्तीसगढ़ी केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि एक पूर्ण विकसित भाषाई प्रणाली है।

राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्जा देकर इसे प्रशासनिक स्तर पर मान्यता दी है। इसी उद्देश्य से छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग का गठन किया गया, जिसकी पहली बैठक 14 अगस्त 2008 को आयोजित हुई। बीजा कार्यक्रम जैसे प्रयासों के माध्यम से लुप्त हो रहे शब्दों का संकलन किया जा रहा है, जो भाषा संरक्षण की गंभीर पहल है। यह दर्शाता है कि राज्य स्तर पर छत्तीसगढ़ी को सशक्त बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं। अब यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि केंद्र सरकार भी इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाए और संवैधानिक स्तर पर इसे मान्यता प्रदान करे।

संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल होना किसी भाषा के लिए केवल प्रतीकात्मक सम्मान नहीं होता। यह उस भाषा को राष्ट्रीय मंच पर स्थापित करता है। इससे उच्च शिक्षा, शोध, अनुवाद और प्रतियोगी परीक्षाओं में भाषा के उपयोग के अवसर बढ़ते हैं। प्रशासनिक प्रक्रियाओं में मातृभाषा का प्रयोग शासन को अधिक संवेदनशील और प्रभावी बनाता है। जब जनता अपनी भाषा में नीतियों को समझती है, तो उसकी भागीदारी और विश्वास दोनों बढ़ते हैं। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहां बड़ी आबादी ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में निवास करती है, वहां मातृभाषा आधारित प्रशासन विकास की गति को तेज कर सकता है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि भारत की 8वीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाएं शामिल हैं। इन भाषाओं को राष्ट्रीय स्तर पर संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। यदि अन्य राज्यों की भाषाओं को यह अधिकार मिल सकता है, तो छत्तीसगढ़ी को इससे वंचित रखना भाषाई समानता के सिद्धांत के विपरीत प्रतीत होता है। भारत का संविधान विविधता को सम्मान देने की बात करता है। भाषाई न्याय उसी भावना का विस्तार है। छत्तीसगढ़ी को 8वीं अनुसूची में शामिल करना किसी अन्य भाषा के अधिकारों को कम करना नहीं होगा, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को और अधिक समावेशी बनाना होगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि राज्य और केंद्र दोनों इस मुद्दे को गंभीरता से लें। राज्य सरकार को सर्वदलीय सहमति के साथ केंद्र के समक्ष औपचारिक प्रस्ताव को प्रभावी रूप से रखना चाहिए, और केंद्र सरकार को भाषाई विविधता को राष्ट्रीय संपदा मानते हुए इस विषय पर सकारात्मक निर्णय लेना चाहिए। यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सांस्कृतिक न्याय का प्रश्न है।

अंततः छत्तीसगढ़ी को 8वीं अनुसूची में स्थान देना उस समाज के आत्मसम्मान को स्वीकार करना है, जिसने सदियों से अपनी भाषा के माध्यम से अपनी पहचान को सुरक्षित रखा है। यह निर्णय छत्तीसगढ़ के विकास, उसकी सांस्कृतिक पहचान और लोकतांत्रिक भागीदारी को नई दिशा देगा। अब विलंब की कोई ठोस वजह नहीं दिखती। समय आ गया है कि छत्तीसगढ़ी को वह संवैधानिक स्थान मिले, जिसकी वह ऐतिहासिक, भाषाई और सामाजिक दृष्टि से पूर्णतः अधिकारी है।

लेखिका परिचय : श्रीमती संपदा दुबे ने छत्तीसगढ़ी विषय में स्नातकोत्तर (एम.ए.) किया है और वे बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की निवासी हैं। वे छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य की गंभीर अध्येता तथा समर्पित लेखिका हैं। क्षेत्रीय भाषा के संरक्षण, संवर्धन और उसे संवैधानिक पहचान दिलाने से जुड़े विषयों पर उनका विशेष ध्यान रहता है।

छत्तीसगढ़ी के इतिहास, व्याकरण, लोकसाहित्य तथा संविधान की 8वीं अनुसूची में इसके समावेश जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर वे शोधपरक और जागरूकतापूर्ण लेखन करती हैं। Email Id: vlograghav1@gmail.com